गीतान्वेषणम् Learning Sanskrit and GeetA together

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Studying Geetaa and Sanskrit together (Chapter 2 Shloka 53) – Post # 59

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Studying Geetaa and Sanskrit together (Chapter 2 Shloka 53) – Post # 59

गीतान्वेषणे (अध्यायः२ श्लोकः ५३) – सोपानः ५९

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला |

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||२-५३||

पदच्छेदैः –

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला |

समाधौ अचला बुद्धिः तदा योगं अवाप्स्यसि ||२-५३||

अन्वयः –

यदा ते श्रुतिविप्रतिपन्ना बुद्धिः निश्चला समाधौ अचला स्थास्यति तदा योगं अवाप्स्यसि |

विशिष्टानां शब्दानां विश्लेषणम् (Detailing specific words) –

(१) श्रुतिविप्रतिपन्ना – सामासिकं स्त्रीलिङ्गि विशेषणम् |

  • श्रुत्या विप्रतिपन्ना (अथवा श्रुतिभिः विप्रतिपन्ना) इति श्रुतिविप्रतिपन्ना (तृतीया-तत्पुरुषः) |
  • श्रुत्या / श्रुतिभिः – श्रुति इति स्त्रीलिङ्गी नाम | तस्य तृतीया विभक्तिः एकवचनं / बहुवचनं च |
    • आपटेवर्याणां शब्दकोशे – श्रुतिः f. [श्रु-क्तिन्] 1 Hearing; चन्द्रस्य ग्रहणमिति श्रुतेः Mu.1.7; R.1.27. -2 The ear; श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतयः R.9.35; Śi.1.1; Ve.3.23. -3 Report, rumour, news, oral intelligence. -4 A sound in general; सा तु वेदश्रुतिं श्रुत्वा दृष्ट्वा वै तमसो निधिम् Rām.7.2.17; स वेत्ति गन्धांश्च रसान् श्रुतीश्च Mb.12.187.19. -5 The Veda (known by revelation, opp. स्मृति; see under वेद); श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्रं तु वै स्मृतिः Ms.2.1,14. -6 A Vedic or sacred text; इति श्रुतेः or इति श्रुतिः ‘so says a sacred text’. -7 Vedic or sacred knowledge, holy learning; यत्रैषा सात्वती श्रुतिः Bhāg.1.4.7;11.3.46. -8 (In music) A division of the octavo, a quarter tone or interval; रणद्भिराघट्टनया नभस्वतः पृथग्विभिन्नश्रुतिमण्डलैः स्वरैः Śi.1.1;11.1; (see Malli. ad loc.). -9 The constellation Śravaṇa. -1 The diagonal of a tetragon, the hypotenuse of a triangle; cf. कर्ण. -11 Direct or expressed signification (opp. लक्षणा); श्रुतिलक्षणाविशये च श्रुतिर्न्याय्या न लक्षणा ŚB. on MS.6.2.2. -12 Speech (वाक्); विविक्तवर्णाभरणा सुखश्रुतिः Ki.14.3. -13 Name, fame (कीर्ति); हैरण्यौ भवतो बाहू श्रुतिर्भवति पार्थिवी Mb.3.35.9. -14 A word, saw, saying; Rām.2.72.25. -15 An explanation of ब्रह्म from the उपनिषद्s; विविधाश्चौपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुतीः Ms.6.29 (com. श्रुतीरुपनिषत्पठितब्रह्मप्रतिपादकवाक्यानि). -16 Advantage, gain (फलश्रुति); उपोष्य संशितो भूत्वा हित्वा वेदकृताः श्रुतीः Mb.12. 265.7. -17 Name, title; बिभ्रत्यनन्यविषयां लोकपाल इति श्रुतिम् Kāv.2.331. -18 Learning. -19 Scholarship
    • अत्र श्रु इति धातुः |
      • धातुपाठसूच्याम् – श्रु । भ्वा०(१) अनिट् प० । श्रु श्रवणे |
      • आपटेवर्याणां शब्दकोशे – श्रु I. 1 P. (श्रवति) To go, move; cf. शृ. -II. 5 P. (शृणोति, शुश्राव, अश्रौषीत्, श्रोष्यति, श्रोतुम्, श्रुत) 1 To hear, listen to, give ear to; शृणु मे सावशेषं वचः V.2; रुतानि चाश्रोषत षट्पदानाम् Bk.2.1; संदेशं मे तदनु जलद श्रोष्यसि श्रोत्रपेयम् Me.13.12. -2 To learn, study; द्वादशवर्षभिर्व्याकरणं श्रूयते Pt.1. -3 To be attentive, to obey. (इति श्रूयते ‘it is so heard’, i. e. is enjoined in the scriptures, such is the sacred precept.) -Caus. (श्रावयति-ते) To cause to hear, communicate, tell, relate, inform; श्रावितो$मात्यसंदेशं स्तन- कलशः Mu.4. -Desid. (शुश्रूषते) 1 To wish to hear. -2 To be attentive or obedient, obey; वाक्यं नैव करोति बान्धवजनो पत्नी न शुश्रूषते Pt.4.78 (where the word may have the next sense also). -3 To serve, wait or attend upon; शुश्रूषस्व गुरून् Ś.4.17; Ku.1.59; Ms.2.244
      • पञ्चमगणीयः शृ-धातुः धातुपाठसूच्याम् न विवृतः |
  • विप्रतिपन्ना – वि + प्रति + पद् इति धातुः | तस्य क्त-प्रत्ययेन कर्मणि-भूतकालवाचकं विशेषणम् “पन्न” | अत्र स्त्रीलिङ्गि |
    • धातुपाठसूच्याम् – पद (पद्)। चु० (१०) सेट् आ० । पद गतौ ॥
      पद्  । दि० (४) अनिट् आ० । पद गतौ ॥
    • आपटेवर्याणां शब्दकोशे – पद् I. 10 Ā. (पदयते) To go or move. -II. 4. Ā. (पद्यते, पन्न; caus. पादयति-ते; desid, पित्सते) 1 To go, move. -2 To go to, approach (with acc.) -3 To attain, obtain, gain; ज्योतिषामाधिपत्यं च प्रभावं चाप्यपद्यत Mb. -4 To observe, practise; स्वधर्मं पद्यमानास्ते Mb. -5 Ved. To fall down with fatigue. -6 Ved. To perish. -7 To fall out. -III. 1 P. (पदति) To stand fast or fixed.
    • अत्र द्वौ उपसर्गौ वि-इति च प्रति-इति च | There are two prefixes here – वि and प्रति. Their meanings also merit study.
      • आपटेवर्याणां शब्दकोशे – वि ind. 1 As a prefix to verbs and nouns it expresses:– (a) separation, disjunction (apart, asunder, away, off &c.), as वियुज्, विहृ, विचल् &c.; (b) the reverse of an action; as क्री ‘to buy'; विक्री, ‘to sell'; स्मृ ‘to remember'; विस्मृ ‘to forget'; (c) division; as विभज्, विभाग; (d) distinction; as विशिष्, विशेष, विविच्, विवेक; (e) discrimination; व्यवच्छेद (f) order, arrange- ment; as विधा, विरच्; (g) opposition; as विरुध्, विरोध; (h) privation; as विनी, विनयन; (i) deliberation, as विचर्, विचार; (j) intensity; विध्वंस. -2 As a prefix to nouns or adjectives not immediately connected with roots, वि expresses (a) negation or privation, in which case it is used much in the same way as अ or निर्, i. e. it forms Bah. comp.; विधवा, व्यसुः &c.; (b) inten- sity, greatness; as विकराल; (c) variety, as विचित्र; (d) difference; as विलक्षण; (e) manifoldness, as विविध; (f) contrariety, opposition, as विलोम; (g) change, as विकार; (h) impropriety, as विजन्मन्.
      • आपटेवर्याणां शब्दकोशे – प्रति ind. 1 As a prefix to verbs it means (a) towards, in the direction of; (b) back, in return, again; तष्ठेदानीं न मे जीवन् प्रतियास्यसि दुर्मते Rām.7.18.13; (c) in opposition to, against, counter; (d) upon, down upon; (see the several roots with this preposition). -2 As a prefix to nouns not directly derived from verbs it means (a) likeness, resemblance, equality; (b) opposite, of the opposite side; प्रतिबल Ve.3.5. ‘the opposing force'; so प्रतिद्विपाः Mu.2.13; (c) rivalry; as in प्रतिचन्द्रः ‘a rival moon'; प्रतिपुरुषः &c. -3 As a separable preposition (with acc.) it means (a) towards, in the direction of, to; तौ दम्पती स्वां प्रति राजधानीं प्रस्थापयामास वशी वसिष्ठः R.2.7;1. 75; प्रत्यनिलं विचेरु Ku.3.31; वृक्षं प्रति विद्योतते विद्युत् Sk.; (b) against, counter, in opposition to, opposite; तदा यायाद् रिपुं प्रति Ms.7.171; प्रदुदुवुस्तं प्रति राक्षसेन्द्रम् Rām.; ययावजः प्रत्यरिसैन्यमेव R.7.55; (c) in comparison with, on a par with, in proportion to, a match for; त्वं सहस्राणि प्रति Ṛv.2.1.8; (d) near, in the vicinity of, by, at, in, on; समासेदुस्ततो गङ्गां शृङ्गवेरपुरं प्रति Rām.; गङ्गां प्रति; (e) at the time, about, during; आदित्यस्योदयं प्रति Mb; फाल्गुनं वाथ चैत्रं वा मासौ प्रति Ms.7.182; (f) on the side of, in favour of, to the lot of; यदत्र मां प्रति स्यात् Sk.; हरं प्रति हलाहलं (अभवत्) Vop.; (g) in each, in or at every, severally (used in a distributive sense); वर्षं प्रति, प्रतिवर्षम्; यज्ञं प्रति Y.1.11; वृक्षं वृक्षं प्रति सिञ्चति Sk.; (h) with regard or reference to, in relation to, regarding, concerning, about, as to; न हि मे संशीतिरस्या दिव्यतां प्रति K.132; चन्द्रोपरागं प्रति तु केनापि विप्रलब्धासि Mu.1; धर्मं प्रति Ś.5.18; मन्दौत्सुक्यो$स्मि नगरगमनं प्रति Ś.1; Ku.6.27; 7.83; त्वयैकमीशं प्रति साधु भाषितम् 5.81; Y.1.218; R.6. 12;1.29;12.51; (i) according to, in conformity with; मां प्रति in my opinion; (j) before, in the presence of; (k) for, on account of. -4 As a separable preposi- tion (with abl.) it means either (a) a representative of, in place of, instead of; प्रद्युम्नः कृष्णात् प्रति Sk.; संग्रामे यो नारायणतः प्रति Bk.8.89; or (b) in exchange or return for; तिलेभ्यः प्रति यच्छति माषान् Sk.; भक्तेः प्रत्यमृतं शंभोः Vop. -5 As the first member of Avyayībhāva compound it usually means (a) in or at every; as प्रतिसंवत्सरम् ‘every year’, प्रतिक्षणम्, प्रत्यहम् &c.; (b) towards, in the direction of; प्रत्यग्नि शलभा डयन्ते. -6 प्रति is sometimes used as the last member of Avyayī. comp. in the sense of ‘a little'; सूपप्रति, शाकप्रति. [Note:– In the com- pounds given below all words the second members of which are words not immediately connected with verbs, are included; other words will be found in their proper places.]
  • श्रुतिविप्रतिपन्ना =
    • शाङ्करभाष्ये – अनेकसाध्यसाधनप्रकाशनश्रुतिभिः श्रवणैः विप्रतिपन्ना नानाप्रतिपन्ना, श्रुतिविप्रतिपन्ना विक्षिप्ता सती
    • श्रीरामानुजाचार्यभाष्ये – श्रुतिः श्रवणम्, अस्मत्तः श्रवणेन विशेषतः प्रतिपन्ना सकलेतरविसजातीयनित्यनिरतिशयसूक्ष्मतत्त्वविषया
    • मधुसूदनसरस्वतीस्वामिनाम् (Translated by Swami Gambhirananda, Published by Advaita Ashram, Kolkatta, 1998) – bewildered, distracted before, on account of having various kinds of doubts and errors from (hearing) the Sruti’s, from hearing about diverse kinds of results, without examining their purport
    • श्रीसंतज्ञानेश्वराणां भावार्थदीपिकायाम् (मराठीभाषायाम् AD 1290) – इंद्रियाचिया संगती । जो प्रसरु होतसे मती । ते स्थिर होईल माघौती । आत्मरूपी ।।२-८३।। समाधिसुखी केवळ । जैं बुद्धि होईल निश्चळ । तैं पावसी तूं सकळ । योगस्थिति ।।२-८४।।
    • लोकमान्य टिळक, गीतारहस्य – (नाना प्रकारच्या) वेदवाक्यांनी गांगरून गेलेली [पूर्वी २.४४ यांत सांगितल्याप्रमाणें वेदवाक्यांतील फलश्रुतीला भुलून जावून, अमक्यासाठी अमुक कर्म कर, अशा प्रकारच्या खटाटोपांत पडल्याने, बुद्धी स्थिर न होतां ती अधिक गांगरून जाते … ]
    • It is challenging to write down meaning of श्रुतिविप्रतिपन्ना. I shall detail my thoughts under “Notes”

(२) निश्चला – निः + चल् इति धातुतः विशेषणम् | अत्र स्त्रीलिङ्गि |

  • निर्गतं चलनम् यस्याः सा निश्चला (नञ्-बहुव्रीहिः)
  • निर्-इति उपसर्गः |
    • आपटेवर्याणां शब्दकोशे – निर् ind. A substitute for निस् before vowels and soft consonants conveying the senses of ‘out of’, ‘away from’. ‘without’, ‘free from’, and be frequently expressed by ‘less’, ‘un’, used with the noun; see the compounds given below; see निस् and cf. अ also.
    • निस् ind. 1 As a prefix to verbs it implies separa- tion (away from, outside of), certainty, completeness or fulness, enjoyment, crossing over, transgressing &c.; (for examples see under (निर्). -2 As a prefix to nouns, not directly derived from verbs, it forms nouns or adjectives, and has the sense of (a) ‘out of’, ‘away from'; as in निर्वन, निष्कौशाम्बि; or (b) more usu- ally, ‘not’, ‘without’, ‘devoid of’ (having a privative force); निःशेष ‘without a remainder'; निष्फल, निर्जल, &c. N. B. In compound the स् of निस् is changed to र् before vowels and soft consonants (see निर्), to a visarga before sibilants, to श् before च् and छ्, and to ष् before क् and प्; cf. दुस्
  • चलन a. [चल् भावे ल्युट्] Moving, tremulous, trembling, shaking. -नः 1 A foot. -2 A deer. -नम् Trembling, shaking or shaking motion; चलनात्मकं कर्म T. S.; हस्त˚, जानु˚ &c.; तरलदृगञ्चलचलनमनोहरवदनजनितरतिरागम् Gīt. 11. -2 Turning or leaving off. -3 Roaming, wandering. -नी 1 A short petticoat worn by common women. -2 The rope for tying an elephant.
  • चल a. [चल्-अच्] 1 (a) Moving trembling, shaking, tremulous, rolling (as eyes &c.); चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि Ś.1.24; चलकाकपक्षकैरमात्यपुत्रैः R.3.28 waving; Bh.1.16. (b) Movable (opp. स्थिर), moving; चले लक्ष्ये Ś.2.5; परिचयं चललक्ष्यनिपातने R.9.49. -2 Unsteady, fickle, in- constant, loose, unfixed; दयितास्वनवस्थितं नृणां न खलु प्रेम चलं सुहृज्जने Ku.4.28; प्रायश्चलं गौरवमाश्रितेषु 3.1. -3 Frail, transitory, perishable; चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवितयौवनम् Bh.3.128. -4 Confused. -लः 1 Trembling, shaking, agitation. -2 Wind. -3 Quicksilver. -4 The supreme being. -ला 1 Lakṣmī, the goddess of wealth. -2 Lightning. -3 A kind of perfume

३) समाधौ – समाधि-इति स्त्रीलिङ्गि नाम | तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनं च |

  • आपटेवर्याणां शब्दकोशे – समाधिः 1 Collecting, composing, concentrating (as mind). -2 Profound or abstract meditation, concentra- tion of mind on one object, perfect absorption of thou- ght into the one object of meditation, i. e. the Supreme Spirit, (the 8th and last stage of Yoga); व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते Bg.2.44; आत्मेश्वराणां न हि जातु विघ्नाः समाधिभेदप्रभवो भवन्ति Ku.3.4,5; Mk.1.1; Bh.3.54. R.8.79; Śi.4.55. -3 Intentness, concentration (in general), fixing of thoughts; यथा भानुगतं तेजो मणिः शुद्धः समाधिना । आदत्ते राजशार्दूल तथा योगः प्रवर्तते ॥ Mb.12.298.12; तस्यां लग्नसमाधि (मानसम्) Gīt.3; अहःसु तस्या हृदि ये समाधयः Rām. ch.2.41. -4 Penance, religious obligation, devotion (to penance); अस्त्येतदन्यसमाधिभीरुत्वं देवानाम् Ś1; तपः- समाधि Ku.3.24; अथोपयन्तारमलं समाधीना 5.24;5.6;1.59; सर्वथा दृढसमाधिर्भव Nāg.5. -5 Bringing together, concentration, combination, collection; union, a set; सा तस्य धर्मार्थसमाधियुक्तं निशम्य वाक्यम् Rām.4.33.5; तं वेधा विदधे नूनं महाभूतसमाधिना R.1.29. -6 Reconciliation, settling or composing differences. -7 Silence. -8 Agreement, assent, promise. -9 Requital. -1 Completion, accom- plishment. -11 Perseverance in extreme difficulties. -12 Attempting impossibilities. -13 Laying up corn (in times of famine), storing grain. -14 A tomb. -15 The joint of the neck; a particular position of the neck; अंसाववष्टब्धनतौ समाधिः Ki.16.21. -16 (In Rhet.) A figure of speech thus defined by Mammaṭa; समाधिः सुकरं कार्यं कारणान्तरयोगतः K. P.1; see S. D.614. -17 One of the ten Guṇas or merits of style; अन्यधर्मस्ततो$न्यत्र लोकसीमानुरोधिना । सम्यगाधीयते यत्र स समाधिः स्मृतो यथा ॥ Kāv.1.93. -18 A religious vow or self-imposed res- traint. -19 Support, upholding.
  • समाधिः = सम् + आ + धिः | आपटेवर्याणां शब्दकोशे – धिः (At the end of comp. only) A receptacle store, reservoir &c.; as in उदधि, इषुधि, वारिधि, जलधि &c.
  • अत्र धि-इति धातुः ? आपटेवर्याणां शब्दकोशे – धि I. 6 P. (धियति) T hold, have, possess. -With सम् to make peace, treat with; cf. संधा -II. (or धिन्व्) 5 P. (धिनोति) To please, delight; satisfy; पश्यन्ति चात्मरूपं तदपि विलुलितस्रग्धरेयं धिनोति Gīt.12; धिनोति नास्माञ्जलजेन पूजा त्वयान्वहं तन्वि वितन्यमाना N.8.97; U.5.27; Ki.1.22.
  • अथवा धी-धातुः | धी 4 Ā (धीयते) 1 To disregard, disrespect. -2 To propitiate. -3 To hold, contain. -4 To accomplish, fulfil.
  • अथवा ध्यै-धातुः | ध्यै 1 P. (ध्यायति, ध्यात; desid. दिध्यासति; pass. ध्यायते) To think of, meditate upon, ponder over, contemplate, reflect upon, imagine, call to mind; ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते Bg.2.62; न ध्यातं पदमीश्वरस्य Bh.3.11; पितॄन् ध्यायन् Ms.3.224; ध्यायन्ति चान्यं धिया Pt.1.136; Me.3; Ms.5.47;9.21.
    • धीः [ध्यै भावे क्विप् संप्रसारणं च] 1 (a) Intellect, understanding; धियः समग्रैः स गुणैरुदारधीः R.3.3; cf. कुधी, सुधी &c. धियो यो नः प्रचोदयात् Gāyatrimantra; तत्राज्ञानं धिया नश्येदाभासात्तु घटः स्फुरेत् Vedāntasāra. (b) Mind; दुष्टधी wicked-minded; स्थितधीः किं प्रभाषेत Bg.2.54; R.3.3. -2 Idea, imagination, fancy, conception; न धियां पथि वर्तसे Ku.6.22; ध्यायन्ति चान्यं धिया Pt.136. -3 A thought, intention, purpose, propensity; इमामहं वेद न तावकीं धियम् Ki.1.37. -4 Devotion, prayer. -5 A sacrifice. -6 Knowledge, science. -7 (in Horoscope) The fifth house from the लग्न.
  • In understanding meaning of समाधौ, it is important to keep in mind the meaning of the prefix उपसर्ग सम् also. सम् ind. 1 As a prefix to verbs and verbal derivatives it means (a) with, together with, together; as in संगम्, संभाषण, संधा, संयुज् &c.). (b) Sometimes it intensifies the meaning of the simple root, and may be translated by ‘very, quite, greatly, thoroughly, very much'; संतुष्, संतोष, संन्यस्, संन्यास, संता &c, तस्या- मात्मानुरूपायामात्मजन्मसमुत्सुकः R.1.33. (c) It also expresses completeness, perfection, or beauty. -2 As prefixed to nouns to form comp. it means ‘like, same, similar’, as in समर्थ. -3 Sometimes it means ‘near’, ‘before’, as in समक्ष. -4 In the Vedas it is sometimes used as a separable preposition (with instr.).
  • समाधौ = In a posture of balance and in the balanced or equanimous state of mind, devoid of any dilemmas or duality or devoid of any bias of any kind

४) अचला = न चला इति अचला (नञ्-तत्पुरुषः)

  • The second part चला has been detailed above when discussing निश्चला
  • The prefix उपसर्ग अ merits detailing. आपटेवर्याणां शब्दकोशे – The first letter of the alphabet; अक्षंराणामकारो$स्मि Bg.1.33. -अः [अवति, अतति सातत्येन तिष्ठतीति वा; अव्-अत् वा, ड Tv.] 1 N. of Viṣṇu, the first of the three sounds constituting the sacred syllable ओम्; अकारो विष्णुरुद्दिष्ट उकारस्तु महेश्वरः । मकारस्तु स्मृतो ब्रह्मा प्रणवस्तु त्रयात्मकः ॥ For more explanations of the three syllables अ, उ, म् see ओम्. -2 N. of Śiva, Brahmā, Vāyu, or Vaiśvānara.– [अः कृष्णः शंकरो ब्रह्मा शक्रः सोमो$निलो$नलः । सूर्यः प्राणो यमः कालो वसन्तः प्रणवः सुखी ॥ Enm. अः स्याद् ब्रह्मणि विष्ण्वीशकूर्माणङ्करणेषु च। गौरवे$न्तःपुरे हेतौ भूषणे$ङ्घ्रावुमेज्ययोः ॥ Nm. अः शिखायां सिद्धमन्त्रे प्रग्राहे$र्के रथार्वणि । चक्रे कुक्कुटमूर्ध्नीन्दुबिम्बे ब्रह्मेशविष्णुषु ॥ ibid. Thus अः means Kṛiṣṇa, Śiva, Brahmā, Indra, Soma, Vāyu, Agni, the Sun, the life-breath, Yama, Kāla, Vasanta, Praṇava, a happy man, a tortoise, a courtyard, a battle, greatness, a female apartment in a palace, an object or a cause, an ornament, a foot, Umā, sacrifice, a flame, a particularly efficacious mantra, reins, the horse of chariot, a wheel, the head of a cock, the disc of the moon]; ind. 1 A Prefix corresponding to Latin in, Eng. in or un, Gr. a or an, and joined to nouns, adjectives, indeclinables (or rarely even to verbs) as a substitute for the negative particle ऩञ्, and changed to अन् before vowels (except in the word अ-ऋणिन्). The senses of न usually enumerated are six–(a) सादृश्य ‘likeness’ or ‘resemblance’, अब्राह्मणः one like a Brāhmaṇa (wearing the sacred thread &c.), but not a Brāhmaṇa; a Kṣatriya, or a Vaiśya; अनिक्षुः a reed appearing like इक्षु, but not a true इक्षु. (b) अभाव ‘absence’, ‘negation’, ‘want’, ‘privation'; अज्ञानम् absence of knowledge, ignorance; अक्रोधः, अनङ्गः, अकण्टकः, अघटः &c. (c) अन्यत्व ‘difference’ or ‘distinction'; अपटः not a cloth, something different from, or other than, a cloth. (d) अल्पता ‘smallness’, ‘diminution’, used as a diminutive particle; अनुदरा having a slender waist (कृशोदरी or तनुमध्यमा). (e) अप्राशस्त्य ‘badness’, ‘unfitness’, having a depreciative sense; अकालः wrong or improper time; अकार्यम् not fit to be done, improper, unworthy, bad act. (f) विरोध ‘opposition’, ‘contrariety'; अनीतिः the opposite of morality; immorality; असित not white, black; असुर not a god, a demon &c. These senses are put together in the following verse :– तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्च ऩञर्थाः षट् प्रकीर्तिताः ॥ See न also. With verbal derivatives, such as gerunds, infinitives, participles, it has usually the sense of ‘not'; अदग्ध्वा not having burnt; अपश्यन् not seeing; so असकृत् not once; अमृषा, अकस्मात् &c. Sometimes in बहुव्रीहि अ does not affect the sense of the second member : अ-पश्चिम that which has no last, i. e. best, topmost; e. g. विपश्चितामपश्चिमः cf. also R.19.1. अनुत्तम having no superior, unsurpassed, most excellent: (for examples see these words). -2 An interjection of (a) Pity (ah !) अ अवद्यं P.I.1.14 Sk. (b) Reproach, censure (fie, shame); अपचसि त्वं जाल्म P.VI.3.73 Vārt. See अकरणि, अजीवनि also. (c) Used in addressing; अ अनन्त. (d) It is also used as a particle of prohibition. -3 The augment prefixed to the root in the formation of the Imperfect, Aorist and Conditional Tenses.
  • N. B.– The application of this privative prefix is practically unlimited; to give every possible case would almost amount to a dictionary itself. No attempt will, therefore, be made to give every possible combination of this prefix with a following word; only such words as require a special explanation, or such as most frequently occur in literature and enter into compounds with other words, will be given; others will be found self-explaining when the English ‘in’, ‘un’, or ‘not’, is substituted for अ or अन् before the meaning of the second word, or the sense may be expressed by ‘less’, ‘free from’, ‘devoid or destitute of’ &c; अकथ्य unspeakable; अदर्प without pride, or freedom from pride; अप्रगल्भ not bold; अभग unfortunate; अवित्त destitute of wealth &c. In many cases such compounds will be found explained under the second member. Most compounds beginning with अ or अन् are either Tatpuruṣa or Bahuvrīhi (to be determined by the sense) and should be so dissolved.

५) स्थास्यति = स्था-इति धातुः | तस्य लृटि (द्वितीय-भविष्ये) मध्यमपुरुषे एकवचनम् |

  • आपटेवर्याणां शब्दकोशे – 1 P. (Ātm. also in certain senses; तिष्ठति- ते, तस्थौ, तस्थे, अस्थात्-अस्थित, स्थास्यति-ते, स्थातुं, स्थित; pass. स्थीयते; the स् of this root is changed to ष् after a preposition ending in इ or उ) 1 To stand; अयं स ते तिष्ठति संगमोत्सुकः Ś.3.13; चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्येकेन बुद्धिमान् Su- bhāṣ -2 To stay, abide, dwell, live; ग्रामे or गृहे तिष्ठति -3 To remain, be left; यावदेकानुदिष्टस्य गन्धो लेपश्च तिष्ठति. Ms.4.111; एको गङ्गदत्तस्तिष्ठति Pt.4. -2 To delay, wait; किमिति स्थीयते Ś.2. -5 To stop, cease, desist, stand still; तिष्ठत्येष क्षणमधिपतिर्ज्योतिषां व्योममध्ये V.2.1. -6 To be kept aside; तिष्ठतु तावत् पत्रलेखागमनवृत्तान्तः K. ‘never mind the account of’ &c. -7 To be, exist, be in any state or position; often with participles; मेरौ स्थिते दोग्धरि दोहदक्षे Ku.1.2; व्याप्य स्थितं रोदसी V.1.1; या स्थिता व्याप्य विश्वं Ś.1.1; कालं नयमाना तिष्ठति Pt.1; Ms.7.8. -8 To abide by, conform to, obey (with loc.); शासने तिष्ठ भर्तुः V.5. 17. R.11.65. -9 To be restrained; यदि ते तु न तिष्ठेयुरुपायैः प्रथमैस्त्रिभिः Ms.7.18. -1 To be at hand, be obtainable; न विप्रं स्वेषु तिष्ठत्सु मृतं शूद्रेण नाययेत् Ms.5.14. -11 To live, breathe; आः क एष मयि स्थिते चन्द्रगुप्तमभिभवितु- मिच्छति Mu.1. -12 To stand by or near, stand at one’s side, help; उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे (राष्ट्रविप्लवे) । राज- द्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥ H.1.71 (v. l.). -13 To rest or depend on; जहातु नैनं कथमर्थसिद्धिः संशय्य कर्णादिषु तिष्ठते यः Ki.3.14. -14 To do, perform, occupy oneself with; न तिष्ठति तु यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् Ms.2.13. -15 (Ātm.) To resort or go to (as an umpire), be guided by the advice of; संशय्य कर्णादिषु तिष्ठते यः Ki.3.14. -16 (Ātm.) To offer oneself to (for sexual embrace), stand as a prostitute (with dat.); गोपी स्मरात् कृष्णाय तिष्ठते Sk. on P.I.4.34. -Caus. (स्थापयति-ते) 1 To cause to stand. -2 To lay, set, place, put. -3 To found, establish. -4 To stop. -5 To arrest, check. -6 To raise, erect. -7 To cause to last or continue, make durable. -8 To give in marriage; लोकश्रेष्ठे गुणवति वरे स्थापिता त्वं मयैव Māl.1.5. -9 To instruct in, ini- tiate into. -Desid. (तिष्ठासति) To wish to stand &c.

६) योगम् = योग-इति पुँल्लिङ्गि नाम | तस्य द्वितीया विभक्तिः एकवचनं च |

  • योगः [युज् भावादौ घञ् कुत्वम्] 1 Joining, uniting. -2 Union, junction, combination; उपरागान्ते शशिनः समुपगता रोहिणी योगम् Ś.7.22; गुणमहतां महते गुणाय योगः Ki.1.25; (वां) योगस्तडित्तोयदयोरिवास्तु R.6.65. -3 Contact, touch, connection; तमङ्कमारोप्य शरीरयोगजैः सुखैर्निषिञ्चन्तमिवामृतं त्वचि R.3.26. -4 Employment, application, use; एतै- रुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् Ms.9.1; R.1.86. -5 Mode, manner, course, means; ज्ञानविज्ञानयोगेन कर्मणा- मुद्धरन् जटाः Bhāg.3.24.17; कथायोगेन बुध्यते H.1. ‘In the course of conversation’. -6 Consequence, result; (mostly at the end of comp on in abl.); रक्षायोगादयमपि तपः प्रत्यहं संचिनोति Ś.2.15; Ku.7.55. -7 A yoke. -8 A convey- ance, vehicle, carriage. -9 (a) An armour. (b) Put- ting on armour. -1 Fitness, propriety, suitableness. -11 An occupation, a work, business. -12 A trick, fraud, device; योगाधमनविक्रीतं योगदानप्रतिग्रहम् Ms.8.165. -13 An expedient, plan, means in general. -14 Ende- avour, zeal, diligence, assiduity; ज्ञानमेकस्थमाचार्ये ज्ञानं योगश्च पाण़्डवे Mb.7.188.45. इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेद् दिवा- निशम् Ms.7.44. -15 Remedy, cure. -16 A charm, spell, incantation, magic, magical art; तथाख्यातविधानं च योगः संचार एव च Mb.12.59.48. -17 Gaining, acquiring, acquisition; बलस्य योगाय बलप्रधानम् Rām.2.82.3. -18 The equipment of an army. -19 Fixing, putting on, practice; सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते Mb.5.34. 39. -2 A side; an argument. -21 An occasion, opportunity. -22 Possibility, occurrence. -23 Wealth, substance. -24 A rule, precept. -25 Dependence, relation, regular order or connection, dependence of one word upon another. -26 Etymology or derivation of the meaning of a word. -27 The etymological meaning of a word (opp. रूढि); अवयवशक्तिर्योगः. -28 Deep and abstract meditation, concentration of the mind, contempla- tion of the Supreme Spirit, which in Yoga phil. is defined as चित्तवृत्तिनिरोध; स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते Bg. 5.21; सती सती योगविसृष्टदेहा Ku.1.21; V.1.1; योगेनान्ते तनुत्यजाम् R.1.8. -29 The system of philosophy established by Patañjali, which is considered to be the second division of the Sāṁkhya philosophy, but is prac- tically reckoned as a separate system; एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति Bg.5.5. (The chief aim of the Yoga philosophy is to teach the means by which the human soul may be completely united with the Supreme Spirit and thus secure absolution; and deep abstract meditation is laid down as the chief means of securing this end, elaborate rules being given for the proper practice of such Yoga or concentration of mind.) -3 A follower of the Yoga system of philosophy; जापकैस्तुल्यफलता योगानां नात्र संशयः Mb.12.2.23. -31 (In arith.) Addition. -32 (In astr.) Conjunction, lucky conjunc- tion. -33 A combination of stars. -34 N. of a parti- cular astronomical division of time (27 such Yogas are usually enumerated). -35 The principal star in a lunar mansion. -36 Devotion, pious seeking after god. -37 A spy, secret agent. -38 A traitor, a violator of truth or confidence. -39 An attack; योगमाज्ञापयामास शिकस्य विषयं प्रति Śiva B.13.7. -4 Steady applica- tion; श्रुताद् हि प्रज्ञा, प्रज्ञया योगो योगादात्मवत्ता Kau. A.1.5; मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी Bg.13.1. -41 Ability, power; एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः Bg. 1.7; पश्य मे योगमैश्वरम् 11.8. -42 Equality, sameness; समत्वं योग उच्यते Bg.2.48.
  • अत्र युज्-इति धातुः | I. 7 U. (युनक्ति, युङ्क्ते, युयोज, युयुजे, अयुजत्, अयौक्षीत्, अयुक्त, योक्ष्यति-ते, योक्तुम्, युक्त) 1 To join, unite, attach, connect, add; तमर्थमिव भारत्या सुतया योक्तुमर्हसि Ku.6.79; see pass. below. -2 To yoke, harness, put to; भानुः सकृद्युक्ततुरङ्ग एव Ś.5.4; ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ Bg.1.14. -3 To furnish or endow with; as in गुणयुक्त. -4 To use, employ, apply; प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते Bg.17.26; Ms.7.24. -5 To appoint, set (with loc.); प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम् Ki.1.1. -6 To direct, turn or fix upon (as the mind &c.). -7 To concentrate one’s attention upon; मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः Bg.6.14; युञ्जन्नेवं सदात्मानम् 15. -8 To put, place or fix on (with loc.). -9 To prepare, arrange, make ready, fit. -1 To give, bestow, confer; दध्यक्षताद्भिर्युयुजुः सदाशिषः Bhāg.1.25.29; आशिषं युयुजे. -11 To adhere or cleave to. -12 To enjoin, charge; उवाच चैनं मेधावी युङ्क्ष्वात्मानमिति प्रभो Mb.15.37.3. -13 To put in, insert. -14 To think or meditate upon. -Pass. (युज्यते) 1 To be joined or united with; रविपीत- जला तपात्यये पुनरोघेन हि युज्यते नदी Ku.4.44; R.8.17. -2 To get, be possessed of; इष्टैर्युज्येथाम् Mv.7; इष्टेन युज्यस्व Ś.5; R.3.65. -3 To be fit or right, be proper, to suit (with loc. or gen.); या यस्य युज्यते भूमिका तां खलु भावेन तथैव सर्वे वर्ग्याः पाठिताः Māl.1; त्रैलोक्यस्यापि प्रभुत्वं त्वयि युज्यते H.1. -4 To be ready for; ततो युद्धाय युज्यस्व Bg.2. 38,5. -5 To be intent on, be absorbed in, be directed towards; दैवकर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम् Ms.3.75;14. 35; Ki.7.13. -6 To be fastened or harnessed. -7 To adhere, to be in close contact. -8 To attain to, pos- sess, obtain. -9 To be made ready. -Caus. (योजयति-ते) 1 To join, unite, bring together; परस्परेण स्पृहणीयशोभं न वेदिदं द्वन्द्वमयोजयिष्यत् R.7.14. -2 To present, give, be- stow; चरोरर्धार्धभागाभ्यां तामयोजयतामुभे R.1.56. -3 To appoint, employ, use; शत्रुभिर्योजयेच्छत्रुम् Pt.4.17. -4 To turn or direct towards; पापान्निवारयति योजयते हिताय Bh. 2.72. -5 To excite, urge, instigate. -6 To perform, achieve. -7 To prepare, arrange, equip. -8 To yoke, harness. -9 To apply, fix, set, place. -1 To furnish or endow with. -11 To surround. -12 To despise, think lightly of. -13 To appoint to. -Desid. (युयुक्षति-ते) To wish to join, yoke, give &c. -II. 1 P., 1 U. (योजति, योजयति-ते) To unite, join, yoke &c.; see युज् above. -III. 4 Ā. (युज्यते) To concentrate the mind (identi- cal with the pass. of युज् I). -IV. 1 Ā. (योजयते) To censure.

७) अवाप्स्यसि – अत्र अव् + आप् इति धातुः | तस्य लृटि (द्वितीय-भविष्ये) मध्यमपुरुषे एकवचनम् |

  • आप् 5. P., rarely 1 P. (आप्नोति or आपति, आप, आपत्, आप्स्यति, आप्तुम्, आप्त) 1 To obtain, attain, get; स शान्तिमाप्नोति न कामकामी Bg.2.7; 3.2; 3.19. पुत्रमेवंगुणोपेतं चक्रवर्तिनमाप्नुहि Ś.1.12; अनुद्योगेन तैलानि तिलेभ्यो नाप्तुमर्हति H. Pr.25; शतं क्रतूनामपविध्नमाप सः R.3.38; so फलम्, कीर्तिम्, सुखम् &c. -2 To reach, go to; overtake, meet, fall in with; शबरीमापतुर्वने Bk.6.59. -3 To pervade, occupy, enter into. -4 To undergo, suffer, meet with; दिष्टान्तमा- प्स्यति भवान् R.9.79; Ms.8.188. -5 To equal. -pass. (आप्यते) 1 To be reached, found, met with, obtained &c. -2 To arrive at one’s end or aim. -3 To become filled. -Caus. (आपयति) 1 To cause to reach or obtain. -2 To cause any one to feel or perceive. -3 To hit.

Overall meaning

Going by the अन्वय

यदा ते श्रुतिविप्रतिपन्ना बुद्धिः निश्चला समाधौ अचला स्थास्यति तदा योगं अवाप्स्यसि |

one can state the meaning as –

When your intellect, (otherwise) confused by what has been learnt and heard earlier, steadies into a state of equanimity, and stays so, not to be distracted or disturbed, then you will attain योग, you will become attuned (with the fundamental truth).

Notes टिप्पण्यः –

  1. This verse is to be read in continuation with the previous one.

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।।२-५२।।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला |

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||२-५३||

As can be seen, the word श्रुतिविप्रतिपन्ना has a continuation from श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च निर्वेदं गन्ता. In a way श्रुतिविप्रतिपन्ना ते बुद्धिः = श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च निर्वेदं गन्तुः ते बुद्धिः

  1. From these two verses, one can say that attaining योग is a two-step process. First get the intellect to transcend श्रुत and श्रोतव्य, i.e. to become श्रुतिविप्रतिपन्ना and next, it should get steadied into a state of equanimity, and should stay so, not to be distracted or disturbed. That is what has been summarized right in the opening सूत्रम् in पातञ्जलि-योगसूत्राणि – योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः |
  2. Actually in saying that “.. intellect should get steadied into a state of equanimity, and should stay so, not to be distracted or disturbed ..” this goes beyond just निरोधः. That probably is the significance of using two negative adjectives निश्चला and अचला. व्यासमुनि or श्रीकृष्णभगवान् must have used these two negative adjectives निश्चला and अचला, with some clear intent. Going by the definitions in Physics, of three states of equilibrium,  getting intellect steadied into a state of equanimity is like the state of Neutral equilibrium. But getting intellect to stay so, not to be distracted or disturbed, is like getting it into the state of Stable equilibrium. The निश्चला-state is of Neutral equilibrium and अचला-state is of Stable equilibrium.
  3. When giving overall meaning, I have interpreted योगमवाप्स्यसि as “.. you will attain योग, you will become attuned (with the fundamental truth) ..”. I contend that fundamental truth is fundamental because it connotes, what is stable, eternal. Intellect getting into the state is of Stable equilibrium is akin to it becoming conjoined with the fundamental truth.
  4. That state must be the state of eternal bliss, right ? The word योग connotes that state योगावस्था. I have copy-pasted what all is available in the dictionary for the word योग. But this word योग, is not just a word to be understood from any dictionary. To attain the state योगावस्था, should be the goal for all human endeavour, for everyone of us. If that is understood, there will be no strife. That, in a way, is the formula for World Peace. That formula is above all precepts of this religion or that religion.
  5. It is wrongly mentioned by some biased and/or ignorant people, that श्रीमद्भगवद्गीता is a scripture of Hinduism. There is no word “Hindu” anywhere in श्रीमद्भगवद्गीता. Just because it is in Sanskrit, it does not become a scripture of Hinduism. Actually none of the so-called Hindu scriptures promote Hinduism. All of them advocate Universal Truth and Universal good.
  6. The word योग and the philosophy of योग is also to be studied and understood for the universal and eternal truth, it connotes. The two-step process of attaining योग, delineated in these two verses is universal and eternal. There is nothing here just for Hindus.
  7. All the guidance given by श्रीकृष्णभगवान् to अर्जुन in श्रीमद्भगवद्गीता is actually guidance for all humanity and it is valid at all times. People all across the world, regardless of their faiths and religions should, rather, must study and understand श्रीमद्भगवद्गीता and imbibe the fundamental truth in their conduct. By that, there will be end of all strife and world will be a happy place to live in.

शुभमस्तु |

-o-O-o-

Written by slabhyankar अभ्यंकरकुलोत्पन्नः श्रीपादः

January 5, 2015 at 12:53 pm

Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verse 52) – Post # 58

with one comment

Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verse 52) – Post # 58

गीतान्वेषणे (अध्याय २ श्लोकः ५२) अष्टपञ्चाशत्तमः (५) सोपानः ।

There has been a long gap in doing this post. Anyway, –

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।।२-५२।।

पदच्छेदैः

यदा ते मोह-कलिलं बुद्धिः व्यतितरिष्यति ।

तदा गन्ता असि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।।२-५२।।

अन्वयः

यदा ते बुद्धिः मोह-कलिलं व्यतितरिष्यति, तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च निर्वेदं गन्ता असि ।

केषाञ्चन शब्दानां विश्लेषणम्

१) मोह-कलिलम्  –

  • मोहस्य कलिलम् इति मोहकलिलम् (षष्ठी-तत्पुरुषः) अथवा मोहः एव कलिलम् (कर्मधारयः) |
  • मोहस्य – मोह इति भाववाचकं पुँल्लिङ्गि नाम | तस्य षष्ठी विभक्तिः एकवचनं च |
    • मोहः [मुह् घञ्] 1 Loss of consciousness, fainting, a swoon, insensibility; मोहेनान्तर्वरतनुरियं लक्ष्यते मुच्यमाना V.1.8; मोहादभूत् कष्टतरः प्रबोधः R.14.56; Ku.3.73; कतिचन पेतुरुपेत्य मोहमुद्राम् Śiva B.28.88. -2 Perplexity, delusion, embarrassment, confusion; यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव Bg.4.35. -3 Folly, ignorance, infatua- tion; तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् R.1.2; Ś.7.25. -4 Error, mistake. -5 Wonder, astonishment. -6 Affliction, pain. -7 A magical art employed to con- found an enemy. -8 (In phil.) Delusion of mind which prevents one from discerning the truth (makes one believe in the reality of worldly objects and to be addicted to the gratification of sensual pleasures); महामोहं च मोहं च तमश्चाज्ञानवृत्तयः Bhāg.3.12.2. -9 Illu- sion of attachment or love; स्वगृहोद्यानगतेी$पि स्निग्धैः पापं विशङ्क्यते मोहात् Pt.2.171.
    • अत्र मुह् इति धातुः |
      • धातुपाठे – मुह वैचित्ये |
      • मुह् 4 P. (मुह्यति, मुग्ध or मूढ) 1 To faint, swoon, lose consciousness, become senseless; इहाहं द्रष्टुमाह्वं तां स्मरन्नेवं मुमोह सः Bk.6.21;1.2;15.16. -2 To be per- plexed or bewildered, to be disturbed in mind, be at a loss; आपत्स्वपि न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः H.1.145; Ki. 18.9. -3 To be foolish, stupid, or infatuated. -4 To fail. -5 To err, mistake. -Caus. (मोहयति-ते) 1 To stupefy, infatuate; मा मूमुहत् खलु भवन्तमनन्यजन्मा Māl.1. 32. -2 To confound, bewilder, perplex; व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे Bg.3.2;4.16. -3 To throw into confusion. -4 To cause to err or mistake.
  • कलिलम्
    • कलिल a. [कल-इलच्] Uṇ.1.54] 1 Covered with, full of. वराङ्गनागणकलिलं नृपात्मजः ततो बलाद् वनमभिनीयते स्म तत् Bu. Ch.3.65. -2 Mixed, blended with; तत एवाक्रन्दकलिलः कलकलः Mv.1. -3 Affected by, subject to; अकल्ककलिलः Śi.19.98. -4 Impervious, impenetrable. -5 Contaminated, defiled; तदा वृषध्वजद्वेषकलिलात्मा प्रजापतिः Bhāg.4.7.1, Śi.19.98. -6 Doubtful, suspicious; एतस्मात्कारणाच्छ्रेयः कलिलं प्रतिभाति मे Mb.12.287.11.
    • -लम् A large heap, confused mass; विशसि हृदय क्लेशकलिलम् Bh.3.34; confusion; यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति Bg.2.52.
    • अत्र कल् इति धातुः
      • धातुपाठे –
        • कल् चु. (१०) उ. – कल गतौ सङ्ख्याने च | [-क्षेपे]
        • कल् भ्वा. (१) आ. – कल शब्दसङ्ख्यानयोः |
      • आपटे-महाभागस्य शब्दकोशे –
        • कल् I. 1 Ā. (कलते, कलित) 1 To count. -2 To sound.
        • -II. 1 U. (कलयति-ते, कलित) 1 To hold, bear, carry, wield, have, put on; करालकरकन्दलीकलितशस्त्रजालैर्बलैः U.5.5; म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् Gīt.1; कलित- ललितवनमालः; हलं कलयते ibid.; कलय वलयश्रेणीं पाणौ पदे कुरु नूपुरौ 12; Mb.12.4.18. -2 (a) To count, reckon; कालः कलयतामहम् Bg.1.3. (b) To measure; सदा पान्थः पूषा गगनपरिमाणं कलयति Bh.2.114. -3 To assume, take, have, possess; कलयति हि हिमांशोर्निष्कलङ्कस्य लक्ष्मीम् Māl.1.22. Śi.4.36,9.59. -4 To know, understand, observe, take notice of, think of; कलयन्नपि सव्यथोवतस्थे Śi.9.83; कोपितं विरहखेदितचित्ता कान्तमेव कलयन्त्यनुनिन्ये 1.29; N.2.65
  • मोहकलिलम् = earful of sounds of mental confusions

२) व्यतितरिष्यति  – वि + अति + तॄ इति धातुः | तस्य लृटि (द्वितीयभविष्ये) प्रथमपुरुषे एकवचनम् |

    • धातुपाठे – तॄ भ्वा० (१) सेट् प० । तॄ प्लवनतरणयोः |
    • आपटे-महाभागस्य शब्दकोशे – तॄ 1 P. (तरति, ततार, अतारीत्, तरि-री-ष्यति, तीर्ण) 1 To cross over, cross; केनोडुपेन परलोकनदीं तरिष्ये Mk.8.23; स तीर्त्वा कपिशाम् R.4.38; Ms.4.77. -2 (a) To cross over, traverse (as a way); (अध्वानं) ततार ताराधिपखण्डधारी Ku.7.48; Me.19. (b) To sail across, navigate (as a river). -3 To float, swim; शिला तरिष्यत्युदके न पर्णम् Bk.12.77; Bṛi. S.8.14. -4 (a) To get over, surmount, overcome, overpower; धीरा हि तरन्त्यापदम् K.175; कृच्छ्रं महत्तीर्णः R.14.6; Pt.4.1; Bg.18.58; Ms.11.34. (b) To subdue, destroy, become master of. -5 To go

 

  • व्यतितरिष्यति = transcends

 

३) श्रोतव्यस्यश्रु-धातुतः तव्यत्-प्रत्ययेन कर्मणिविध्यर्थवाचकं विशेषणम् श्रोतव्य | प्रायः नपुंसकलिङ्गि | तस्य षष्ठी विभक्तिः एकवचनं च |

  • धातुपाठे – श्रु श्रवणे
  • आपटे-महाभागस्य शब्दकोशे – श्रु I. 1 P. (श्रवति) To go, move; cf. शु. -II. 5 P. (शृणोति, शुश्राव, अश्रौषीत्, श्रोष्यति, श्रोतुम्, श्रुत) 1 To hear, listen to, give ear to; शृणु मे सावशेषं वचः V.2; रुतानि चाश्रोषत षट्पदानाम् Bk.2.1; संदेशं मे तदनु जलद श्रोष्यसि श्रोत्रपेयम् Me.13.12. -2 To learn, study; द्वादशवर्षभिर्व्याकरणं श्रूयते Pt.1. -3 To be attentive, to obey. (इति श्रूयते ‘it is so heard’, i. e. is enjoined in the scriptures, such is the sacred precept.) -Caus. (श्रावयति-ते) To cause to hear, communicate, tell, relate, inform; श्रावितो$मात्यसंदेशं स्तन- कलशः Mu.4. -Desid. (शुश्रूषते) 1 To wish to hear. -2 To be attentive or obedient, obey; वाक्यं नैव करोति बान्धवजनो पत्नी न शुश्रूषते Pt.4.78 (where the word may have the next sense also). -3 To serve, wait or attend upon; शुश्रूषस्व गुरून् Ś.4.17; Ku.1.59; Ms.2.244.
  • श्रोतव्यस्य = of what is to be listened to, of what is to be learnt, of what is to be understood

४) श्रुतस्यश्रु-धातुतः क्त-प्रत्ययेन कर्मणिभूतकालवाचकं विशेषणम् श्रुत | अत्र नपुंसकलिङ्गि | तस्य षष्ठी विभक्तिः एकवचनं च |

  • श्रुतस्य = of what is learnt in the past

५) निर्वेदं – निर् + वेदम्

  • निर्वेदम् is opposite of वेदम्
  • वेदम् is an abstract noun denoting a state or result of the action implicit in the verb धातु. Here the धातु is विद्. अत्र विद् इति धातुः -
  • धातुपाठे – विद् । चु० (१०) सेट् आ० । विद चेतनाख्याननिवासेषु |
    विद् । अ० (२) सेट् प० । विद ज्ञाने |
    विद् । दि० (४) अनिट् आ० । विद सत्तायाम् |
    विद् । तु० (६) सेट् उ० । विदॢ लाभे |
    विद् । रु० (७) अनिट् आ० । विद विचारणे |
  • विद् I. 2 P. (वेत्ति or वेद, विवेद-विदांचकार, अवेदीत्, वेत्स्यति, वेत्तुम्, विदित; desid. विविदिषति) 1 To know, understand, learn, find out, ascertain, discover; न चैतद्विमः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः Bg.2.5; तं मोहान्धः कथमय- ममुं वेत्तु देवं पुराणम् Ve.1.23;3.39; Ś.5.27; R.3.43; Bg.4.34;18.1. -2 To feel, experience; परायत्तः प्रीतेः कथमिव रसं वेत्ति पुरुषः Mu.3.4. -3 To look upon, regard, consider, know or take to be; य एनं वेत्ति हन्तारम् Bg.2. 19; विद्धि व्याधिव्यालग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् Moha M.5; Bg.2.17; Ms.1.33; Ku.6.3. -Caus. (वेदयति-ते) 1 To make known, communicate, inform, apprise, tell.
  • निर्वेदम् = state of being unconcerned, In शाङ्करभाष्यम् this word निर्वेदम् has been interpreted as वैराग्यम्, which also is state of being unconcerned.

६) गन्ता – गम्-धातुतः तृच्-प्रत्ययेन कर्तृवाचकं विशेषणम् गन्तृ | अत्र पुँल्लिङ्गि | तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनं च |

  • धातुपाठे – गम् – भ्वा० (१) अनिट् प० । गमॢ-[गतौ]
  • आपटे-महाभागस्य शब्दकोशे – 1 P. (गच्छति, जगाम, अगमत्, गमिष्यति, गन्तुम्, गत desid.; जिगमिषति, जिगांसते Ātm.; freq. जङ्गम्यते; जङ्गमीति or जङ्गन्ति) 1 To go, move in general; गच्छत्वार्या पुनर्दर्शनाय V.5; गच्छति पुरः शरीरं धावति पश्चादसंस्तुतं चेतः Ś.1.33; क्वाधुना गम्यते ‘where art thou going’. -2 To depart, go forth, go away, set forth or out; उत्क्षिप्यैनां ज्योतिरेकं जगाम Ś.5.3. -3 To go to, reach, resort to, arrive at, approach; यदगम्यो$पि गम्यते Pt.1.7; एनो गच्छति कर्तारम् Ms.8.19 the sin goes to (recoils on) the doer; 4.199; so धरणिं मूर्ध्ना गम् &c. -4 To pass, pass away, elapse (as time); दिनेषु गच्छत्सु R.3.8 as days rolled on, in course of time; Me.85; काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् H.1.1; गच्छता कालेन in the long run. -5 To go to the state or condition of, become, undergo, suffer, partake of &c. (usually joined with nouns ending in. -ता, -त्व &c, or any noun in the acc.); गमिष्या- म्युपहास्यताम् R.1.3; पश्चादुमाख्यां सुमुखी जगाम Ku.1.26 went by or received the name of Umā; so तृप्तिं गच्छति becomes satisfied; विषादं गतः became dejected; कोपं न गच्छति does not become angry; आनृण्यं गतः became released from debt; मनसा गम् to think of, remember; Ku.2.63; वृषेण गच्छतः riding a bull; Ku.5.8. -6 To cohabit, have sexual intercourse with; गुरोः सुतां … यो गच्छति पुमान् Pt.2.17; Y.1.8. -Caus. (गमयति-ते) 1 To cause to go, lead or reduce to (as a state); गमितः गतिम् Ku.4.24; Bh.3.38; Ki.2.7. -2 To spend, pass (as time). -3 To make clear, explain, expound. -4 To signify, denote, convey an idea or sense of; द्वौ नञौ प्रकृतार्थ गमयतः ‘two negatives make one affirma- tive’. -5 To send to. -6 To bring to a place (acc.). -7 To impart, grant, bestow. -8 To intend, mean.
  • गन्ता = One who goes, one who reaches or attains (… a state, status, position, etc.)

७) असि – अस् इति धातुः | तस्य लटि (वर्तमानकाले) मध्यमपुरुषे एकवचनम् |

  • धातुपाठे – अस् । भ्वा० सेट् उ० । अस गतिदीप्त्यादानेषु १. १०२९ ॥
    अस् । अ० सेट् प० । अस भुवि २. ६० ॥
    अस् । दि० सेट् प० । असु क्षेपने ४
  • आपटे-महाभागस्य शब्दकोशे – अस् – I. 2 P. [अस्ति, आसीत्, अस्तु, स्यात्; defective in non-conjugational tenses, its forms being made up from the root भू.] 1 To be, live, exist (showing mere existence); नासदासीन्नो सदासीत् Rv.1.129.1; आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् Ait. Up.1.1. श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात् Ms.2.14; शपथे नास्ति पातकम् 8.112; न त्वेवाहं जातु नासम् Bg.2.12; आसीद्राजा नलो नाम Nala. 1.1; Ms.5.79; न अस् not to be, to be lost, disappear, perish, नायमस्तीति दुःखार्ता Nala.7.16; अस्ति भोक्तुम् Sk. it has to be eaten; (for other uses of अस्ति see अस्ति s. v.). -2 To be (used as a copula or verb of incomplete predication, being followed by a noun or adjective or adverb; or some other equivalent); भक्तो$सि मे सखा च Bg.4.3; धार्मिके सति राजनि Ms.11.11; आचार्ये संस्थिते सति 5.8; so एवमेव स्यात्, तूष्णीमासीत् &c. -3 To belong to, be in the possession of (expressed in English by have), with gen. of possessor; यन्ममास्ति हरस्व तत् Pt.4.76; यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा 5.7; न हि तस्यास्ति किंचित् स्वम् Ms.8.417; नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य Bg.2.66. -4 To fall to the share of, to happen to or befall anyone (with gen.); यदिच्छामि ते तदस्तु Ś.4. तस्य प्रेत्य फलं नास्ति Ms.3.139 he cannot enjoy or get. -5 To arise, spring out, occur; आसीच्च मम मनसि K.142 (this) occurred to my mind. -6 To become; तां दृष्ट्वा दशविस्तारामासं विंशतियोजनः Rām.; also शुक्लीस्यात् राजसात् स्यात् &c. Sk. -7 To lead or tend to, turn out or prove to be (with dat.); स स्थाणुः स्थिरभक्ति- योगसुलभो निःश्रेयसायास्तु वः V.1.1; संगतं श्रीसरस्वत्योर्भूतये$स्तु सदा सताम् 5.24; oft. with dat. alone without अस्; यतस्तौ स्वल्पदुःखाय Pt.1. -8 To suffice (with dat.); सा तेषां पावनाय स्यात् Ms.11.85; अन्यैर्नृपालैः परिदीयमानं शाकाय वा स्याल्लवणाय वा स्यात् Jagannātha. -9 To stay, reside, dwell, live हा पितः क्वासि हे सुभ्रु Bk.6.11. -1 To take place, happen. -11 To be in a particular relation, to be affected (with loc.); किं नु खलु यथा वयमस्यामेवमियम- प्यस्मान् प्रति स्यात् Ś.1. अस्तु well, let it be; एवमस्तु, तथास्तु so be it, amen. The form आस joined to roots in forming their periphrastic perfect is sometimes separated from the root and used by itself; तं पातयां प्रथममास पपात पश्चात् R.9.61,16.86. [cf. L. est and Gr. esti. with अस्ति; esse; Zend. āsti; Pers. hast, ast] With अति to be over, excel, surpass. -अनु to be at hand; reach. -अपि (with loc. or an adv. of place) 1 to be in any- thing. -2 to belong to, be closely connected with. -अभि 1 to belong to, to fall to one’s share; यन्मममाभि- ष्यात् Sk. -2 to be over. -3 to excel, surpass. -4 to domineer or to tyrannize over, rule over. -आविस् to arise, spring up, be visible; आचार्यकं विजयि मान्मथ- माविरासीत् Māl.1.26. -उप to be near to or in. -परि 1 to be in the way. -2 to surpass. -3 to pass or spend (time). -4 to pervade. -प्र 1 to be in front of. -2 to be in extraordinary degree, to preponderate, excel, surpass. -प्रति 1 to be equal to, be a match for. -2 to rival, emulate, vie with. -3 to be a repre- sentative of, stand in place of. -प्रादुस् to appear, spring up; प्रादुरासीत्तमोनुदः Ms.1.6; R.11.15. -व्यति (Atm. व्यतिहे, व्यतिसे; व्यतिस्ते) to excel, surpass, be above or superior to, out-weigh; अन्यो व्यतिस्ते तु ममापि धर्मः Bk.2.35. -अस् II.4. P. (अस्यति, आस, आस्थत्, असितुम्, अस्त) 1 To throw, cast, hurl, discharge, shoot (with loc. of the mark); हस्ते बिभर्ष्यस्तवे Śvet. Up.3.6; तस्मिन्नास्थदिषीकास्त्रम् R.12.23; Bk.15.91, 14.77; sometimes with dat. or gen. दस्यवे हेतिमस्य Rv.1.13.3. -2 To drive away, remove. -3 To frighten or scare away. -4 To throw or take away, let go, leave, give up; as in अस्तमान, अस्तशोक, अस्तकोप see अस्त. -5 To fight with; युयोध बलिरिन्द्रेण तारकेण गुहो$- स्यत Bhāg.8.1.28. -With अति to shoot beyond or at, overpower (with arrows); अत्यस्त having shot beyond, having surpassed or excelled; joined in acc. (Tat. comp.; P.II.1.24.) -अभिप्र to throw over or upon, hurl at. -परिनि to stretch. -अस् III. 1 U (असति-ते, असित). 1 To go. -2 To take or receive, seize. -3 To shine (The examples usually cited to illustrate this sense are:- निष्प्रभश्च प्रभूरास भूभृताम् R.11.81; तेनास लोकः पितृमान् विनेत्रा 14.23; लावण्य उत्पाद्य इवास यत्नः Ku.1.35. But the sense of दिदीपे or ‘shone’ is far-fetched, though Vāmana is disposed to take it. It seems preferable to regard आस in these instances as equivalent to बभूव, either taking it, as Śākaṭāyana does, as an indeclinable तिडन्तप्रति- रूपकमव्ययम्, or considering it, as Vallabha does, as an ungrammatical form used against the rules of gram- mar, प्रामादिकः प्रयोगः; see Malli. on Ku.1.35).

८) शाङ्करभाष्ये गन्तासि = प्राप्स्यसि You will attain.

 

अन्वयार्थः Overall meaning –

यदा = when

ते बुद्धिः = your intellect, your mind

मोह-कलिलं = earful of sounds of mental confusions

व्यतितरिष्यति = will transcend

तदा = then

श्रोतव्यस्य = of what is to be listened to, of what is to be learnt, of what is to be understood

श्रुतस्य च = and  of what is learnt in the past

निर्वेदं = state of being unconcerned

गन्ता असि = you will attain.

By paraphrasing –

When your intellect, your mind will transcend earful of sounds of mental confusions, then you will attain state of being unconcerned of what is to be listened to, of what is to be learnt, of what is to be understood and of what is learnt in the past.

 

टिप्पण्यः Notes -

1) “Being unconcerned of what is learnt in the past” actually requires “unlearning”. I get to recall the instance when I taught to my grandson first, the geometrical construction of bisecting a line-segment by drawing the perpendicular bisector. Next I taught him dividing a line-segment into any number of equal parts (by using the theory of similar triangles). Very promptly my grandson asked, why not use the latter method also for bisecting. Gosh ! He made me unlearn ! It was unwarranted notion ingrained in my mind that bisection by perpendicular bisector and more divisions by similar triangles. Textbooks on geometry, must be all over the world follow this notion. Aren’t there unwarranted notions ingrained in our mind ? Aren’t ways of the mind subtle ? Yes, we must unlearn unwarranted notions. First of all we must realise that there are unwarranted notions in our mind.

 

2) By his learning of the past, also by his mind getting habituated to a notion, Arjuna had it ingrained in his mind that द्रोणाचार्य and भीष्माचार्य were persons to be respected. He had to unlearn that, because, that cannot be so, when they are in the opposite camp in the war.

 

3) The most important word in this श्लोक appeals to be मोहकलिलम्. The धातु from which word मोह is derived is मुह्. This धातु itself is interesting, because it has two past passive participles मुग्ध and मूढ. Do not these participles themselves bring forth, that मोहकलिलम् can be just मुग्धता or can be as serious as मूढता.

 

4) When detailing the word निर्वेदम्, it was noted that निर्वेदम् is opposite of वेदम् and that वेदम् is an abstract noun. No such noun as वेदम् is however found in the dictionary. But, in as much as it is used here in गीता, may be, grammarians can explain its derivation.

 

5) The अन्वय of this श्लोक is a complex sentence having two clauses, (1) यदा ते बुद्धिः मोह-कलिलं व्यतितरिष्यति adverbial sub-clause and (2) तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च निर्वेदं गन्ता असि the main clause. The verb व्यतितरिष्यति of the subclause is in future tense. Yet verb असि in the main clause is in present tense ! Is it grammatically correct ? This is however in the manner of saying “when such and such thing will happen, such and such result is certain.” So when one wants to speak of certainty of a result, provided a stated condition will be fulfilled, it becomes good to use the present tense in the main clause, right ?

 

6) Giving certainty is giving assurance. In this second अध्याय of गीता, श्रीकृष्णभगवान् seems to have employed all four techniques साम-दाम-दंड-भेद of challenging an adversity or challenging an adverse person. Can we call this one, of giving assurance of a positive result, as सामनीति ?

 

7) The condition यदा ते बुद्धिः मोह-कलिलं व्यतितरिष्यति, is also quite forceful, especially the verb व्यतितरिष्यति. It wants मोह-कलिलं to be so transcended, that it will not return. People often seem to question, whether it was necessary for गीतोपदेश to have been so long as of 700 श्लोक-s. श्रीकृष्णभगवान् definitely wanted that the मोह-कलिलं must go away and also wanted it to get so removed that it will not return. By this token गीतोपदेश is an example how a psychiatrist should treat the patient ! And on the battlefield there was no option of a number of sessions with the patient. The option then was of whatever number of अध्याय-s were needed, until Arjuna himself assuredly said, नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा, स्थितोऽस्मि गतसन्देहः, करिष्ये वचनं तव (१८-७३). Treatment of an unsettled mind is complete, only when the patient himself gives such statement of assurance. In such instances, it is not the doctor’s certificate, but the patient’s assurance, which is important, right ?

 

शुभमस्तु |

-o-O-o-

 

Written by slabhyankar अभ्यंकरकुलोत्पन्नः श्रीपादः

December 14, 2014 at 10:05 am

Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verse 51) – Post # 57

with one comment

Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verse 51) – Post # 57
संस्कृतभाषायाः तथा श्रीमद्भगवद्गीतायाः 
अध्ययनस्य (अध्याय २ श्लोकः ५१) सप्तपञ्चाशत्तमः (५) सोपानः ।

हरिः ॐ !

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ।।२-५१।।


१ संधि-विच्छेदान् कृत्वा –

कर्मजं बुद्धियुक्ताः हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।

जन्मबन्धविनिर्-मुक्ताः पदं गच्छन्ति अनामयम् ।।२-५१।।

२ समासानां विग्रहाः शब्दानां व्युत्पत्तयः  विश्लेषणानि च ।

बुद्धियुक्ताः मनीषिणः कर्मजं फलं त्यक्त्वा हि 

 बुद्धियुक्ताः - “बुद्धियुक्त” इति सामासिकं विशेषणम् । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः बहुवचनम् च ।

  • १-१ बुद्ध्या युक्तः इति बुद्धियुक्तः (तृतीया-तत्पुरुषः) ।
  • १-२ बुद्ध्या – “बुध्” (= to know, to think) इति धातुः । तस्मात् स्त्रीलिङ्गि नाम “बुद्धि” (= intellect) । तस्य तृतीया विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • १-३ युक्तः – “युज्” इति धातुः । तस्मात् भूतकालवाचकं विशेषणम् “युक्त” (= enjoined with) । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनं च ।
  • १-४ बुद्धियुक्ताः = those with intellect, those who know, the wise, the magi
  • Commenting on this post, Dr. Avinash Sathaye provided some interesting information on the derivation of the word ‘magi’. Here is what he detailed – ‘magi’ is actually a plural of “magus”. Apparently, originally, it only referred to certain Persian priests and the word is related to “magic” and the word was in use by the Greeks for several centuries before it got used in the Bible. The translation as “wise men” is a later invention.
  • I first came across this word ‘magi’ in a short story by O. Henry having the title ‘Gift of the Magi’.

 मनीषिणः - “मनीषिन्” (= wise, learned, intelligent, clever, thoughtful, prudent) इति विशेषणम् । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः बहुवचनं च ।

  • The word मनीषिन् has in it मन् + ईष् + इन्

    • मन्  = दिवादि (4 आ.) । मन ज्ञाने (= to know। तनादि (8 आ.) मनु अवबोधने (= to understand। चुरादि (10 आ.) मान स्तम्भे (= to deliberate) 
    • ईष् = भ्वादि (1 प.) ईष उञ्चे (= ??) । भ्वादि (1 आ.) ईष गतिहिंसादर्शनेषु (= to move, to harm, to see) 
    • न् = having
    • मनीषिन् = One having knowledge, understanding, deliberation, movement (i.e. action), vision
      • मनीषिन् = one having ardent devotion

 कर्मजम् “कर्मज” इति सामासिकं विशेषणम् । अत्र नपुंसकलिङ्गि । तस्य द्वितीया विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • 3-1 कर्मणः जायते इति कर्मजम् (उपपद-तत्पुरुषः) ।
  • 3-2 कर्मणः – “कृ” इति तनादि (8) उभयपदी धातुः ।  तस्मात् नपुंसकलिङ्गि नाम “कर्मन्” (= work, job, action, task, function) । तस्य पञ्चमी अथवा षष्ठी विभक्तिः एकवचनम् च । अत्र पञ्चमी 
  • 3-3 जायते – “जन्” (= to be born, to emanate) इति धातुः । तस्य वर्तमानकाले प्रथमपुरुषे एकवचनम् ।
  • 3-4 कर्मजम् = born of action, result of action

 फलम् – “फल” (= fruit, result) इति नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य द्वितीया विभक्तिः एकवचनम् च । 

५ त्यक्त्वा – “त्यज्” इति धातुः । त्यज हानौ (त्यज् = to forsake) । तस्मात् क्त्वान्तं अव्ययं “त्यक्त्वा” (= on forsaking) 

६ हि – (= because, of course, also, even, only) इति अव्ययम् । 

जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः अनामयम् पदं गच्छन्ति

७ जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः – “जन्मबन्धविनिर्मुक्त” इति सामासिकं विशेषणम् । तस्य प्रथमा विभक्तिः बहुवचनं च ।

  • जन्मनः बन्धः इति जन्मबन्धः (षष्ठी-तत्पुरुषः) । 
  • जन्मबन्धात् विनिर्मुक्तः इति जन्मबन्धविनिर्मुक्तः (पञ्चमी-तत्पुरुषः) 
  • जन्मनः – “जन्मन्” (= birth) इति नपुंसकलिङ्गि नाम ।  तस्य षष्ठी विभक्तिः एकवचनं च । 
  • बन्धः – “बन्ध” (= bond, bondage) इति पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनं च 
  • विनिर्मुक्तः – “वि + निर् + मुच्” इति धातुः । मुच्लृ मोक्षणे (मुच् = to release) । तस्मात् भूतकालवाचकं विशेषणम् “विनिर्मुक्त” (= emancipated। अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनं च 
  • जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः =  emancipated of the bondage of (cycle of) birth(s)

८ अनामयम् - “अनामय” इति सामासिकं विशेषणम्  अत्र नपुंसकलिङ्गि  तस्य द्वितीया विभक्तिः एकवचनं च ।

  • न आमयः यस्य तत् अनामयम् (नञ्-बहुव्रीहिः) 
  • आमयः – “आमय” (= disease, illness, degradation) इति पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनं च 
  • अनामयम् = non-degradable

९ पदम् – “पद” (= status, state) इति नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य द्वितीया विभक्तिः एकवचनं च 

१० गच्छन्ति – “गम्” इति 1 प. धातुः । गम्लृ गतौ (गम् = to go, to reach) । तस्य वर्तमानकाले प्रथमपुरुषे बहुवचनम् ।  

३ व्याकरणात्मकं विश्लेषणम् Grammatical Analysis -

  1. The three words बुद्धियुक्ताः, मनीषिणः, जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः are all in प्रथमा विभक्तिः बहुवचनम् 
  2. They match well with the only verb गच्छन्ति (प्रथम-पुरुषे बहुवचनम्).
  3. But they are all adjectives.
  4. The most common pronoun, which would usually be the implicit subject कर्तृपदम् is ते. So, ते गच्छन्ति –> ते अनामयं पदं गच्छन्ति = They attain the non-degradable status.
  5. But who can be ‘they’, who can attain the non-degradable status ?

    1. The obvious answer is

      1. Those, who are बुद्धियुक्ताः, मनीषिणः, जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः and also कर्मजं फलं त्यक्त्वा हि
        1. So, from this श्लोक we get four-step sequence to attain the non-degradable status.
        2. बुद्धियुक्ताः – Intellect tuned up appropriately 
        3. मनीषिणः – those with devout and ardent mind
        4. कर्मजं फलं त्यक्त्वा हि – only by renouncing fruit or result of any action
        5. जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः - those who are freed of the bondage of being born
        6. अनामयं पदं गच्छन्ति – attain the non-degradable status.
      2. Tattain the non-degradable status should be the ultimate goal of all human endeavor.

४ अन्वयाः वाक्यांशशः अनुवादाश्च Translations -

  1. By not considering any implicit words, simple अन्वय becomes कर्मजं फलं त्यक्त्वा हि बुद्धियुक्ताः मनीषिणः जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः अनामयम् पदं गच्छन्ति ।
  2. The distinct steps outlined in grammatical analysis become clearer by introducing some implicit words as below -

    1. (ये) बुद्धियुक्ताः मनीषिणः (सन्ति) – Those, who have appropriate intellect and are determined (whole-heartedly focused)…
    2. (ते) कर्मजं फलं त्यक्त्वा हि – (even if they are so) only after giving up (aspiration for) fruits (results) of actions
    3. जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः (भूत्वा) – (on becoming) emancipated of the bondage of (cycle of) birth(s)
    4. अनामयम् पदं गच्छन्ति – attain the non-degradable status.

५ Meter of this verse वृत्तम् (छन्दः वा)
To decipher the meter we set the verse in four quarters -

कर्मजं बुद्धियुक्ताः हि । अक्षराणि ८
फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । अक्षराणि ८
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः । अक्षराणि ८
पदं गच्छन्त्यनामयम् । अक्षराणि ८

अत्र अनुष्टुभ् छन्दः । अस्य लक्षणपदम् – श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयम् सर्वत्र लघु पञ्चमम् । द्विचतुष्-पादयोर्-र्हस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ।।

६ टिप्पण्य: ।  Comments, Notes, Observations, if any.

६-१ The word मनीषिणः

  •  One comes across this word also in ईशावास्योपनिषत्. In his commentary ईशावास्यवृत्ति Acharya Vinoba Bhave gives its derivation as मनसः इष्टे गति = मनीषी. The grammar of this derivation-statement is rather confusing. मनसः इष्टा गतिः यस्य सः मनीषी seems to be simpler and clearer. It becomes further clearer by a syntactic rearrangement as मनसः इष्टा गतिः यस्य सः मनीषी = यस्य मनसः गतिः (यथा) इष्टा सः मनीषी =   One, who has flow of thoughts in the mind only as is desirable. So, मनीषी means a person, who has control over his mind. That, to have control over one’s mind, is of course the biggest challenge, One who has attained that is मनीषी !
  • In ईशावास्योपनिषत् the word मनीषी has another companion word कविः. निरुक्त is said to explain (rather define) this companion word कविः as क्रान्तदर्शिनः कवयः = those, who are able to see beyond. 
  • Acharya Vinoba Bhave gives a very good explanation of these two words being good companions of each other. कवि, who sees ‘beyond’ has mind, which has vast compass. But मनीषी is one, who has control on the mind. A person, who is both कवि and मनीषी appeals to be a person most eligible for अनामयं पदम् the non-degradable status.
शुभमस्तु ।
-o-O-o-
 

Written by slabhyankar अभ्यंकरकुलोत्पन्नः श्रीपादः

March 31, 2013 at 11:59 am

Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verses 49 and 50) – Post # 56

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Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verses 49 and 50) – Post # 56
संस्कृतभाषायाः तथा श्रीमद्भगवद्गीतायाः 
अध्ययनस्य (अध्याय २ श्लोकौ ४९, ५०) षट्-पञ्चाशत्तमः (५) सोपानः ।

हरिः ॐ !

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ।।२-४।।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।।२-५०।।

सन्धि-विच्छेदान् कृत्वा –

 

दूरेण हि अवरं कर्म बुद्धियोगात् धनंजय ।
बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ।।२-४
बुद्धियुक्तः जहाति इह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्मात् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।।२-५०।।

अन्वयाः -

  1. धनंजय, कर्म बुद्धियोगात् दूरेण अवरम् हि (अस्ति)
    1. (अथवा) कर्म बुद्धियोगात् दूरेण हि अवरम् (अस्ति)
    2. (अथवा) हि कर्म बुद्धियोगात् दूरेण अवरम् (अस्ति) – (गौणः वाक्यांश:)
  2. (त्वम्) बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ ।
  3. फलहेतवः कृपणाः (सन्ति) ।
  4. बुद्धियुक्तः इह उभे सुकृतदुष्कृते जहाति ।
  5. तस्मात् (त्वम्) योगाय युज्यस्व ।
  6. योगः कर्मसु कौशलम् (अस्ति) ।

वाक्यांशानां विश्लेषणानि  Analysis of clauses –

वाक्यांश-
क्रमाङ्कः
उद्गारवाचकम्, संबोधनम् वा संबन्धजसूचकम् कर्तृपदम् कर्मपदम् अथवा पूरकपदम् अव्ययम्,
इतरे शब्दाः
क्रियापदम् अथवा धातुसाधितम् वाक्यांशस्य प्रकारः
धनंजय कर्म अवरं दूरेण हि बुद्धियोगात् (अस्ति) प्रधान:
(त्वम्) शरणम् बुद्धौ अन्विच्छ प्रधान:
फलहेतवः कृपणाः (भवन्ति) प्रधान:
बुद्धियुक्तः उभे सुकृतदुष्कृते इह जहाति प्रधान:
तस्मात् त्वम् योगाय युज्यस्व प्रधान:
योगः कर्मसु कौशलम् (अस्ति) प्रधान:

३ समासानां विग्रहाः शब्दानां व्युत्पत्तयः  विश्लेषणानि च ।

धनंजय, कर्म बुद्धियोगात् दूरेण अवरम् हि (अस्ति)

१ धनंजय – “धनंजय” इति सामासिकं पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य संबोधन-प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • १-१ धने जयः यस्य सः धनंजयः (बहुव्रीहिः) ।
  • १-२ धने – “धन” (= wealth, glory ) इति नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • १-३ जयः – “जि” इति धातुः । तस्मात् पुंल्लिङ्गि नाम “जय” (= victory) । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
    • १-३-१ “जि” इति भ्वादि (१) अनिट् परस्मैपदी धातुः । जि जये (जि = to win) ।
    • १-३-२ जि अभिभवे (जि = to overpower) ।
  • १-४ धनञ्जय = One, who has won wealth or glory.
    • १-४-१ I think as an epithet of अर्जुन, ‘one who has won glory’ becomes a more appropriate meaning of धनञ्जय.
    • १-४-२ धनञ्जय = ‘one, who has overpowered crave for wealth’ also becomes an appropriate meaning.

२ कर्म   – “कृ” इति तनादि (8) उभयपदी धातुः ।  तस्मात् नपुंसकलिङ्गि नाम “कर्मन्” (= work, job, action, task, function)। तस्य द्वितीया विभक्तिः एकवचनम् च ।

३ बुद्धियोगात् – “बुद्धियोग” इति सामासिकं पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य पञ्चमी विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • 3-1 बुद्धिः एव योगः (कर्मधारयः) अथवा
  • 3-2 बुद्ध्या योगः (तृतीया-तत्पुरुषः)
  • 3-3 योगः “युज्” इति धातुः । तस्मात् पुंल्लिङ्गि नाम “योग” । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनम् च ।
    • ३-३-१ “युज्” इति दिवादि (४) अनिट् आत्मनेपदी धातुः । युज समाधौ (युज् = to meditate) ।
    • ३-३-२ “युज्” इति रुदादि (७) अनिट् उभयपदी धातुः । युजिर् योगे (युज् = to join) ।
    • ३-३-३ “युज्” इति चुरादि (१०) सेट् उभयपदी धातुः । युज संयमने (युज् = to control, to regulate) ।

४ दूरेण – “दूर” (= distant) इति विशेषणम् । अत्र नपुंसकलिङ्गि । तस्य तृतीया विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • दूरेण = from afar, in long sight, by far sight

५ अवरम् – “अवर” इति सामासिकं विशेषणम् । अत्र नपुंसकलिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • 5-1 न वरम् इति अवरम् (नञ्-तत्पुरुषः)
  • 5-2 वरम् – “वृ” इति स्वादि (5) उ. धातुः । वृञ् वरणे (वृ = to prefer) । तस्मात् “वर” (= preferable) इति विशेषणम् । अत्र नपुंसकलिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • 5-3 अवरम् = not preferable

६ हि – (= because, of course, also, even) इति अव्ययम् ।

(त्वम्) बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ

७ बुद्धौ – “बुध्” इति भ्वादि (1-प.) तथा दिवादि (4 आ.) धातुः । बुध अवगमने (बुध् = to understand, to realize, to know) ।  तस्मात् स्त्रीलिङ्गि नाम “बुद्धि” (= intellect) । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनं च ।

८ शरणम् – “शृ (ऋ-दीर्घ)” इति क्र्यादि (9-प.) धातुः । शृ (ऋ-दीर्घ) हिंसायाम् (शृ (ऋ-दीर्घ) = to harm) । तस्मात् नपुंसकलिङ्गि नाम “शरण” (= surrender) । तस्य द्वितीया विभक्तिः एकवचनं च ।

९ अन्विच्छ – “अनु + इष्” इति तुदादि (6-प.) धातुः । इष इच्छायाम् (इष् = to desire) । तस्य लोट्-आज्ञार्थे मध्यमपुरुषे एकवचनम् ।

फलहेतवः कृपणाः 

१० फलहेतवः – फलहेतु-इति सामासिकं पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य प्रथमा विभक्तिः बहुवचनं च ।

  • 10-1 फलस्य हेतुः (षष्ठी-तत्पुरुषः) । अथवा
    • 10-1-1 फलं एव हेतुः (कर्मधारयः) । अथवा
    • 10-1-2 फलं हेतुः यस्याः सः (बहुव्रीहिः)
  • 10-2 हेतुः – “हि” इति स्वादि (5-प.) धातुः । हि गतौ वृद्धौ च (हि = to reason) । तस्मात् तुन्-प्रत्ययेन पुंल्लिङ्गि नाम “हेतु” (= reason, purpose) । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनं च ।
  • 10-3 फल = fruit, fulfillment
  • 10-4 फलहेतवः = having purpose of fulfillment, aspirations for fruit

११ कृपणाः – “कृप्” इति धातुः । तस्मात् विशेषणं “कृपण” (= miserly, mean) । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः बहुवचनं च ।

  • 11-1 “कृप्” इति भ्वादि (1-आ.) धातुः । कृपू सामर्थ्ये (कृप् = to be capable)
  • 11-2 “कृप्” इति चुरादि (10-उ.) धातुः । कृप दौर्बल्ये (कृप् = to be weak, mean, miserly) । कृपेश्च (अवकल्कने । मिश्रीकरणे इत्येके । चिन्तने इत्यन्ये)

बुद्धियुक्तः इह उभे सुकृतदुष्कृते जहाति

१२ बुद्धियुक्तः – “बुद्धियुक्त” इति सामासिकं विशेषणम् । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनं च ।

  • 12-1 बुद्ध्या युक्तः (तृतीया तत्पुरुषः) ।
  • 12-2 युक्तः – “युज्” इति धातुः । तस्मात् क्त-प्रत्ययेन विशेषणं “युक्त” (= appropriated with) । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनं च ।
    • See details under 3-3

१३ इह – (= here) इति अव्ययम्
१४ उभे – “उभ” (= both, two together) इति सार्वनामिकं विशेषणम् । अत्र नपुंसकलिङ्गि । तस्य द्वितीया विभक्तिः द्विवचनम् च ।
१५ सुकृतदुष्कृते – “सुकृतदुष्कृत” इति सामासिकं नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य द्वितीया विभक्तिः द्विवचनम् च ।

  • 15-1 सुकृतं च दुष्कृतं च (इतरेतर-द्वंद्वः) ।
  • 15-2 सुष्ठु कृतं इति सुकृतं ।
  • 15-3 दुःखेन कृतं इति दुष्कृतम् ।
  • 15-4 सुकृतदुष्कृते = both good deeds and bad deeds

१६ जहाति – “हा” इति अदादि (2 – प.) धातुः । ओहाक् त्यागे (हा = to forgo, to forsake) । तस्य वर्तमानकाले प्रथमपुरुषे एकवचनम् ।

तस्मात् (त्वम्) योगाय युज्यस्व 
१७ तस्मात् = “तत्” इति सर्वनाम । तस्य पञ्चमी विभक्तिः एकवचनं च । अत्र अव्ययात्मकः उपयोगः । तस्मात् = (from that), hence, therefore
१८ योगाय – See 3-3. Here चतुर्थी विभक्तिः एकवचनम् ।
१९ युज्यस्व – “युज्” इति धातुः । तस्य आज्ञार्थे मध्यमपुरुषे एकवचनम् ।

योगः कर्मसु कौशलम् 
२० योगः – See 3-3
२१ कर्मसु – See (2). Here सप्तमी विभक्तिः बहुवचनम् च ।
२२ कौशलम् – “कुश्” इति दिवादि (4-प.) धातुः । कुश संश्लेषणे (कुश् = to adhere to) । तस्मात् “कौशल” (= adherence, skill) इति नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

४ वाक्यांशशः अनुवादाः Translations -

  1. धनंजय, कर्म बुद्धियोगात् दूरेण अवरम् हि (अस्ति)  = Hey धनंजय, in far sight, being involved in work is inferior only, to intellectual involvement.
    1. (अथवा) कर्म बुद्धियोगात् दूरेण हि अवरम् (अस्ति) = (OR) being involved in work is inferior to intellectual involvement only from a distant view.
    2. (अथवा) हि कर्म बुद्धियोगात् दूरेण अवरम् (अस्ति) – (गौणः वाक्यांश:) = (OR) Because involved in work is inferior only, to intellectual involvement, ….
  2. (त्वम्) बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ = think of being in surrender to intellect.
  3. फलहेतवः कृपणाः (सन्ति) = Aspirations of fruits are mean (aims) OR having aspirations of fruits is mean.
  4. बुद्धियुक्तः इह उभे सुकृतदुष्कृते जहाति = One with intellect forgoes both good deeds and bad deeds OR one with intellect does not consider whether work on hand is good or bad.
  5. तस्मात् (त्वम्) योगाय युज्यस्व = Hence, enjoin yourself in योग.
  6. योगः कर्मसु कौशलम् (अस्ति) = योग is doing work to the best of one’s ability OR योग is nothing but adherence to work, not shying away from it.

५ Meter of these verses वृत्तम् (छन्दः वा)
To decipher the meter we set the verse in four quarters –

दूरेण ह्यवरं कर्म । वर्णाः ८
बुद्धियोगाद्धनंजय । वर्णाः ८
बुद्धौ शरणमन्विच्छ । वर्णाः ८
कृपणाः फलहेतवः । वर्णाः ८

अत्र अनुष्टुभ् छन्दः । अस्य लक्षणपदम् – श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयम् सर्वत्र लघु पञ्चमम् । द्विचतुः पादयोर्-र्हस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ।।

Section 5 Comments, Notes, Observations, if any.

स्वाध्यायः ५ – टिप्पण्य: ।  

५-१ As mentioned previously योग certainly has many shades of meaning and many definitions. Earlier we come across one definition समत्वं योग उच्यते. Here is the second definition योगः कर्मसु कौशलम्.

  • Commonly known meaning of कौशलम् is skill, i.e. doing work to the best of one’s ability.
  • Etymology of कौशलम्, from धातु ‘कुश्’ gives meaning of कौशलम् also as ‘adherence’, adherence to work, not shying away from it. This meaning seems more appropriate in the context that Arjuna was not wanting to fight, was inclined to shy away from fighting the battle. His कौशलम्, once he undertakes, was never in question. The problem was primarily with his not being inclined, not adhering
  • I am happy that exploring meanings by going into the etymology brings forth such charming shades of meaning.

५-२ Only impromptu I chose to study these two श्लोक-s together. Happily in ज्ञानेश्वरी also these two श्लोक-s are together.

५-३ There are words here- बुद्धियोगात्, बुद्धियुक्तः, योगाय, युज्यस्व finally leading to another definition of योग. But considering that the verb युज् itself has so many inflections as detailed under 3-3, it becomes interesting to understand the meaning with all aspects of the verb युज्.

  • 5-3-1 This becomes furthermore interesting, considering that many syntactical options are possible for phrases/clauses. Every other option is marked by OR.
    • Phrase/clause (1), has 3 options
    • Phrase/clause (3) has 2 options and
    • Phrase/clause (6) has 2 options
  • 5-3-2 Paraphrasing all these options would develop mathematically, into 12 different paraphrasing outputs.
  • 5-3-3 It is said that when Ganesh agreed to be the stenographer to take down narration of महाभारतम् by व्यासमुनि, Ganesh put forth a condition that at no point his pen should be made to wait. व्यासमुनि also put a counter condition that Ganesh would not just go on taking down. He must get the full meaning of what is being taken down. And during narration व्यासमुनि composed many verses where Ganesha also had to ponder. That got time for व्यासमुनि to be ready with further narration. 12 different mathematically possible paraphrasing outputs here would have given व्यासमुनि enough lot of time in this instance !

 

शुभमस्तु ।
-o-O-o-
 

Written by slabhyankar अभ्यंकरकुलोत्पन्नः श्रीपादः

November 5, 2012 at 6:07 pm

Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verse 48) – Post # 55

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Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verse 48) – Post # 55
संस्कृतभाषायाः तथा श्रीमद्भगवद्गीतायाः
अध्ययनस्य (अध्याय २ श्लो: ४८) पञ्च-पञ्चाशत्तमः (५५) सोपानः ।

हरिः ॐ !

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||२-४८||
सन्धि-विच्छेदान् कृत्वा समासानां पदानि च दर्शयित्वा –
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धि-असिद्ध्योः समः भूत्वा समत्वं योगः उच्यते ||२-४८||
अत्र सन्धयः –>

  1. सिद्ध्यसिद्ध्योः = सिद्धि-असिद्ध्योः (स्वर-संधिः)
  2. समो भूत्वा = समः भूत्वा (विसर्ग-संधिः)
  3. योग उच्यते = योगः उच्यते (विसर्ग-संधिः)

अन्वयाः -

  1. धनंजय, सङ्गं त्यक्त्वा,
  2. सिद्ध्यसिद्ध्योः  समः भूत्वा,
  3. योगस्थः कर्माणि कुरु ।
  4. समत्वं योगः (इति) उच्यते ।

वाक्यांशानां विश्लेषणानि  Analysis of clauses –

वाक्यांश-
क्रमाङ्कः
उद्गारवाचकम् वा संबोधनम् संबन्ध-सूचकम् कर्तृपदम् कर्मपदम् अथवा पूरकपदम् क्रियापदम् अथवा धातुसाधितम् क्रियाविशेषणानि इतरे शब्दाः वाक्यांशस्य प्रकारः
धनंजय सङ्गं त्यक्त्वा गौणः
सिद्ध्यसिद्ध्योः  समः भूत्वा गौणः
योगस्थः (त्वम्)  कर्माणि कुरु प्रधान:
समत्वं योगः (इति) उच्यते प्रधान:

३ समासानां विग्रहाः शब्दानां व्युत्पत्तयः  विश्लेषणानि च ।

धनंजय, सङ्गं त्यक्त्वा

१ धनंजय – “धनंजय” इति सामासिकं पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य संबोधन-प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • १-१ धने जयः यस्य सः धनंजयः (बहुव्रीहिः) ।
  • १-२ धने – “धन” (= wealth, glory ) इति नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • १-३ जयः – “जि” इति धातुः । तस्मात् पुंल्लिङ्गि नाम “जय” (= victory) । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
    • १-३-१ “जि” इति भ्वादि (१) अनिट् परस्मैपदी धातुः । जि जये (जि = to win) ।
    • १-३-२ जि अभिभवे (जि = to overpower) ।
  • १-४ धनञ्जय = One, who has won wealth or glory.
    • १-४-१ I think as an epithet of अर्जुन, ‘one who has won glory’ becomes a more appropriate meaning of धनञ्जय.
    • १-४-२ धनञ्जय = ‘one, who has overpowered crave for wealth’ also becomes an appropriate meaning.

२ सङ्गं – “सम् + गम्” इति भ्वादि (१) अनिट् परस्मैपदी धातुः । गम्लृ गतौ (गम् = to go) । तस्मात् पुंल्लिङ्गि नाम “सङ्ग” (= going with, keeping company, having attachment) । तस्य द्वितीया विभक्तिः एकवचनम् च ।

३ त्यक्त्वा – “त्यज्” इति भ्वादि (१) अनिट् परस्मैपदी धातुः । त्यज हानौ (त्यज् = to forsake) । तस्मात् त्वान्तं अव्ययात्मकं कृदन्तं त्यक्त्वा (= on forsaking) ।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समः भूत्वा

४ सिद्ध्यसिद्ध्योः “सिद्ध्यसिद्धि” इति सामासिकं नाम । तस्य षष्ठी अथवा सप्तमी विभक्तिः द्विवचनम् च ।

  • ४-१ सिद्धिः च असिद्धिः च सिद्ध्यसिद्धि (इतरेतर-द्वंद्वः) –> तयोः (षष्ठी विभक्तिः द्विवचनम्) ।
  • ४-२ सिद्धिः – “सिध्” इति धातुः । तस्मात् स्त्रीलिङ्गि नाम “सिद्धि” (= attainment, fulfillment) ।
    • ४-२-१ “सिध्” इति भ्वादि (१) सेट् परस्मैपदी धातुः । षिध गत्याम् (सिध् = to move, to attain) । षिधू शास्त्रे माङ्गल्ये च (सिध् = to set up, to systematize) ।
    • ४-२-२ “सिध्” इति दिवादि (४) अनिट् परस्मैपदी धातुः । षिधु संराद्धौ (सिध् = to attain, to fulfill) ।

५ समः – “सम” (= equal) इति विशेषणम् । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

६ भूत्वा – “भू” इति भ्वादि (१) सेट् परस्मैपदी धातुः । भू सत्तायाम् (भू = to be, to become) । तस्मात् त्वान्तं अव्ययात्मकं कृदन्तं भूत्वा (= on being) ।

योगस्थः कर्माणि कुरु ।

७ योगस्थः – “योगस्थ” इति सामासिकं विशेषणम् । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • ७-१ योगे तिष्ठति इति योगस्थः (उपपद-तत्पुरुषः) । “स्थ”-इति “तिष्ठति”-इत्यर्थकं उपपदम् ।
  • ७-२ योगे – “युज्” इति धातुः । तस्मात् पुंल्लिङ्गि नाम “योग” । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनम् च ।
    • ७-२-१ “युज्” इति दिवादि (४) अनिट् आत्मनेपदी धातुः । युज समाधौ (युज् = to meditate) ।
    • ७-२-२ “युज्” इति रुदादि (७) अनिट् उभयपदी धातुः । युजिर् योगे (युज् = to join) ।
    • ७-२-३ “युज्” इति चुरादि (१०) सेट् उभयपदी धातुः । युज संयमने (युज् = to control, to regulate) ।
  • ७-३ तिष्ठति – “स्था” इति भ्वादि (१) अनिट् परस्मैपदी धातुः । ष्ठा गतिनिवृत्तौ (स्था = to stand, to halt, to stop, to stand still) । तस्य लट्-वर्तमाने प्रथमपुरुषे एकवचनम् ।
    • The phrase गतिनिवृत्तौ used in धातुपाठ for the meaning of the verb स्था is interesting. By this phrase desisting from motion. That also requires effort. Hence in his laws of motion, Newton defined force which will disturb a body from its “state of rest or of uniform motion”.
    • I wonder whether गतिनिवृत्ति would also cover “not disturbing uniform motion” also. So, does गतिनिवृत्ति mean zero velocity or zero acceleration ?
  • ७-४ योगस्थः = One who has steadied himself in योग.
    • Considering various shades of meaning, it seems that at least in the context of योग, गतिनिवृत्ति means zero acceleration. Because योग does not mean zero velocity !
    • Even the advice here is “योगस्थः कर्माणि कुरु”, which certainly is not zero velocity !
    • This actually takes us to the definition of योग. It would be good to detail this under “Notes and Comments टिप्पण्यः”

८ कर्माणि – “कृ” -इति तनादि (८) उभयपदी धातुः ।  तस्मात् नपुंसकलिङ्गि नाम “कर्मन्” (= work, job, action, task, function। तस्य (अत्र) द्वितीया विभक्तिः बहुवचनम् ।

९ कुरु – “कृ” -इति तनादि (८) उभयपदी धातुः । अत्र परस्मैपदी । तस्य लोट्-आज्ञार्थे मध्यमपुरुषे एकवचनम् ।

समत्वं योगः (इति) उच्यते

१० समत्वम् – “सम” (= equal, equal to) इति विशेषणम् । तस्मात् त्व-प्रत्ययेन तद्धितं नपुंसकलिङ्गि नाम “समत्व” (= equanimity) । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
११ उच्यते – “वच्” इति अदादि (२) उभयपदी धातुः । वच परिभाषणे (वच् = to say, to call) । अत्र कर्मणिप्रयोगे वर्तमानकाले प्रथमपुरुषे एकवचनम् ।

Overall meaning of समत्वं योगः (इति) उच्यते = Equanimity is called as योग.

४ वाक्यांशशः अनुवादाः Translations -

  1. धनंजय, सङ्गं त्यक्त्वा = Hey Dhanajaya (Arjuna), by forsaking all attachments
  2. सिद्ध्यसिद्ध्योः  समः भूत्वा = by being equal (i.e. equanimous) between fulfillment or non-fulfillment
  3. योगस्थः कर्माणि कुरु = By being steadfast in योग do the tasks
  4. समत्वं योगः (इति) उच्यते = Equanimity is (itself) called as योग.

५ Meter of this verse वृत्तम् (छन्दः वा)
To decipher the meter we set the verse in four quarters –

योगस्थः कुरु कर्माणि । वर्णाः ८
सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय । वर्णाः ८
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा । वर्णाः ८
समत्वं योग उच्यते । वर्णाः ८
अत्र अनुष्टुभ् छन्दः । अस्य लक्षणपदम् – श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयम् सर्वत्र लघु पञ्चमम् । द्विचतुः पादयोर्-र्हस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ।।

Section 5 Comments, Notes, Observations, if any.

५ – टिप्पण्य: Notes –

५-१ The word योग certainly has many shades of meaning and many definitions. समत्वं योग उच्यते is one definition we come across in this श्लोक. Further on in this second chapter we shall come across another definition योगः कर्मसु कौशलम्. Almost everybody is familiar with योगसूत्राणि of पातञ्जलि which opens with his definition योगः चित्तवृत्तिनिरोधः Of course what is mentioned here as समत्वं, does demand चित्तवृत्तिनिरोधः or समत्वं is one type of or one stage of or one aim of चित्तवृत्तिनिरोधः and hence of योग.

५-२ All the words as सिद्धि, योग, कर्म, कौशलम् are rich with so many shades of meaning that it becomes challenging to grasp the full import of this definition here समत्वं योग उच्यते. Basically however, this definition demands training of one’s mind to be equanimous.

५-३ The focus here seems to be on attainment सिद्धि. This word सिद्धि implies a preset objective. Failure to attain the preset objective would cause the mental agony due to non-attainment i.e, असिद्धि. That raises a question whether one should conceive any सिद्धि, an aim, a goal, a target and then work towards attaining it. Having preset goals can also be termed akin to embarking on an action plan with a संकल्प. This is another aspect, which also is dealt with in गीता.

५-४ We shall come across this word संकल्प in 6-2 and further on also. But the mention of सिद्धि and असिद्धि here also imply that context. What is said about संकल्प in 6-2 will come in our study in due course.

शुभमस्तु ।
-o-O-o-

Written by slabhyankar अभ्यंकरकुलोत्पन्नः श्रीपादः

September 28, 2012 at 4:47 am

Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verse 47) – Post # 54

with one comment

Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verse 47) – Post # 54
संस्कृतभाषायाः तथा श्रीमद्भगवद्गीतायाः
अध्ययनस्य (अध्याय २ श्लो: ४७) चतुःपञ्चाशत्तमः (५४) सोपानः ।

हरिः ॐ !

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||२-४७||

Exercise 1 Rewrite this by breaking conjugations and showing component-words contained in compound words.
स्वाध्यायः १ सन्धि-विच्छेदान् कृत्वा समासानां पदानि च दर्शयित्वा पुनर्लिखतु एतत् ।
कर्मणि एव अधिकार: ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतु: भूः मा ते सङ्गः अस्तु अकर्मणि ||२-४७||

अत्र सन्धयः –>

  1. कर्मण्येवाधिकारस्ते
    1. कर्मणि एव = कर्मण्येव (स्वर-संधिः)
    2. कर्मण्येव अधिकार: = कर्मण्येवाधिकारः (स्वर-संधिः)  (विसर्ग-संधिः)
    3. कर्मण्येवाधिकारः ते = कर्मण्येवाधिकारस्ते (विसर्ग-संधिः)
  2. कर्मफलहेतुर्भूर्मा
    1. कर्मफलहेतु: भूः = कर्मफलहेतुर्भूः (विसर्ग-संधिः)
    2. कर्मफलहेतुर्भूः मा = कर्मफलहेतुर्भूर्मा (विसर्ग-संधिः)
  3. सङ्गोऽस्त्वकर्मणि
    1. सङ्गः अस्तु = सङ्गोऽस्तु (विसर्ग-संधिः)
    2. सङ्गोऽस्तु अकर्मणि = सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (स्वर-संधिः)
Exercise 2 Paraphrase the clauses

स्वाध्यायः २ वाक्यांशशः अन्वयान् वाक्यांशानां विश्लेषणानि च ददतु
अन्वयाः -

  1. कर्मणि एव ते अधिकार: (भवति) ।
  2. फलेषु कदाचन मा (भवति) ।
  3. कर्मफलहेतुर्भूः मा (भव) ।
  4. अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु ।

वाक्यांशानां विश्लेषणानि  Analysis of clauses –

वाक्यांश-
क्रमाङ्कः
उद्गारवाचकम् वा संबोधनम् संबन्ध-सूचकम् कर्तृपदम् कर्मपदम् अथवा पूरकपदम् क्रियापदम् अथवा धातुसाधितम् क्रियाविशेषणानि इतरे शब्दाः वाक्यांशस्य प्रकारः
ते अधिकार: (भवति) कर्मणि एव प्रधान:
(ते अधिकार:) मा (भवति) फलेषु कदाचन प्रधान:
(त्वम्) कर्मफलहेतुर्भूः मा (भव) प्रधान:
ते सङ्गः मा अस्तु अकर्मणि प्रधान:

Note :-

  1. Three of the four sentences are negative. They all use मा as the negative auxiliary.

स्वाध्यायः ३ समासानां विग्रहान् शब्दानां व्युत्पत्तीः विश्लेषणानि च ददतु ।
Exercise ३ Decipher the compound words, and detail grammatical analysis of all words

कर्मणि एव ते अधिकार: (भवति)

१ कर्मणि – “कर्मन्” (= work, job, task, assignment, execution) इति नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनम् च ।

२ एव (= only) इति अव्ययम् ।

३ ते – “युष्मद्” (= pronoun of second person, you) इति सर्वनाम । तस्य चतुर्थी अथवा षष्ठी विभक्तिः (अत्र षष्ठी) एकवचनम् च ।

४ अधिकार: – “अधि + कृ” इति धातुः । तस्मात् पुल्लिङ्गि नाम “अधिकार” (= authority, command) | तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • ४-१ कृ इति भ्वादि (१) अनिट् उभयपदी धातुः । कृञ् करणे (कृ = to do) ।
  • ४-२ कृ इति तनादि (८) अनिट् उभयपदी धातुः । डुकृञ् करणे (कृ = to do) ।
  • ४-३ अधि = having authority, having command

कर्मणि एव ते अधिकार: (भवति) = you have authority only at execution

फलेषु (ते अधिकार:) कदाचन मा (भवति)

५ फलेषु – “फल” (= fruit, result) इति नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य सप्तमी विभक्तिः बहुवचनम् च ।

६ कदाचन (= anytime) इति अव्ययम् ।तद्धितं विशेषणम् । अत्र पुल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

७ मा (= not) इति नकारार्थि क्रियापदस्य सहाय्यकारि अव्ययम् ।

फलेषु (ते अधिकार:) कदाचन मा (भवति) = You do not have anytime authority or command over (determining or demand on) the result.

कर्मफलहेतु: मा भूः
८ कर्मफलहेतु: – “कर्मफलहेतु” इति सामासिकं विशेषणम् । अत्र पुल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • ८-१ कर्मणः फलं इति कर्मफलम् (षष्ठी-तत्पुरुषः) ।
  • ८-२ कर्मफले हेतुः कर्मफलहेतुः (सप्तमी-तत्पुरुषः)
  • ८-३ कर्मफलहेतुः (भूतः वा भवति) यस्य सः कर्मफलहेतुर्भूः (बहुव्रीहिः) ।
  • ८-४ हेतुः – “हेतु” इति पुल्लिङ्गि नाम । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
    • ८-४-१ हेतु = cause, reason
    • ८-४-२ हेतु = motive, purpose
    • ८-४-३ हेतु =instrument, element
  • ८-४ भूः “भू” इति भ्वादि परस्मैपदी धातुः । भू सत्तायाम् (भू = to be, to attain) । तस्मात् विशेषणम् “भूः” (= being, existing, becoming) ।
  • ८-५ कर्मफलहेतुर्भूः = one, doing a task, by having a motive or purpose (in turn an expected result) in mind

कर्मफलहेतु: मा भूः = Do not become involved in actions by a reason or purpose or by an objective or by an expected end-result. (That means, “do actions for just doing them.”)

अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु
९ अकर्मणि – “अकर्मन्” इति सामासिकं नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • ९-१ न कर्म अकर्म (नञ्-तत्पुरुषः) ।
  • ९-२ अ –
    • ९-२-१ Abhyankar’s dictionary of Sanskrit Grammar mentions that this letter has eighteen varieties caused by accentuation or nasalization or lengthening. That is some study in phonetics !!! (The dictionary is available for free download at http://www.scribd.com/doc/59628245/Abhyankar-Dictionary-of-Sanskrit-Grammar)
    • ९-२-२ In Apte’s dictionary, it is mentioned that a negative prefix would have use for six different shades of meaning !
      • ९-२-२-१ The six shades of negative meanings are summarized in a श्लोक – तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्वं विरोधश्च नञर्था षट् प्रकीर्तिताः ।।
    • ९-२-३ Now I understand some significance of the mention in the 10th chapter – अक्षराणां अकारोऽस्मि । (१०-३३). Amongst letters I am the letter अ.
  • ९-३ अकर्म = Since अकार has a negative prefix would have six shades of negative meanings, this word अकर्म would also have all those six shades of meanings.
    • ९-३-१ तत्सादृश्यम् = (It is like that, but it is not that) अकर्म would hence mean what looks like कर्म but is not कर्म.
      • In a mood of being jocular, if someone would ask me, “Well, what is going on ?” I would say, “Looking busy !”. Now I realize that, that jocular response of mine was actually one shade of meaning of अकर्म.
    • ९-३-२ अभाव: = lack of; Hence अकर्म = lack of कर्म; i.e. कर्म not being in evidence
    • ९-३-३ तदन्यत्वम् = what is, is different from what is expected (or desired) to be
    • ९-३-४ तदल्पता = what is, is too little or too short of. People often do their job, holding something up their sleeves. A clerk or a peon not putting up the file or the officer not disposing off pending matters, often in expectation of gratis payment are doing work, which is too little or too short. All such work is अकर्म and in turn अधर्म. With all due respects to Shri. Anna Hazare, I sincerely feel that war against corruption should actually be a war against all such grass-root tendencies towards अकर्म and in turn अधर्म. Would not a person doing अकर्म often be a corrupt person with a corrupt mind ?
    • ९-३-५ अप्राशस्त्वम् = unbecoming, unfitting. In the four श्लोक-s 33 to 36, already studied, there is enough detailing of what and how it would be unbecoming of अर्जुन, not to fight the war.
    • ९-३-६ विरोधः = opposition; If अर्जुन would go away when all his brothers and all the पाण्डवसैन्य wanted to fight the war, his going away would become opposition to their कर्म. In turn it would be अकर्म of अर्जुन.

१० सङ्गः – “सम् + गम्” इति भ्वादि (१) अनिट् परस्मैपदी धातुः । गमु गतौ (गम् = to go) । तस्मात् पुल्लिङ्गि नाम “सङ्ग” (= going with, being with, being in the company of, accompaniment of, affliction of) । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
११ अस्तु – “अस्” इति अदादि (२) सेट् परस्मैपदी धातुः । अस भुवि (अस् = to be) । तस्य लोट्-आज्ञार्थे प्रथमपुरुषे एकवचनम् ।

अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु  = May you not have the affliction of अकर्म.

Exercise 4 In what meter is this verse composed ?
स्वाध्यायः ४ – अस्य काव्यस्य रचना कस्मिन् वृत्ते अस्ति ?

To decipher the meter we set the verse in four quarters –

कर्मण्येवाधिकारस्ते । वर्णाः ८
मा फलेषु कदाचन । वर्णाः ८
मा कर्मफलहेतुर्भूर् – वर्णाः ८
मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।। वर्णाः ८
अत्र अनुष्टुभ् छन्दः । अस्य लक्षणपदम् – श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयम् सर्वत्र लघु पञ्चमम् । द्विचतुः पादयोर्-र्हस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ।।

Exercise 5 Comments, Notes, Observations, if any.

स्वाध्यायः ५ – टिप्पण्य: ।  

५-१ Having detailed six shades of negative meanings of the prefix अ, I am feeling more than happy for having had this urge to do this project of ‘Learning together Sanskrit and GeetA’. Maybe, this project is becoming almost a ‘dictionary’ of गीता. The difference is that in a dictionary the diction is detailed in alphabetical order. I am following the order, by which one comes across the words in गीता. I believe that this effort is hence unique and useful. It certainly is for me. Of course it is an exercise in self-study. I am of course indebted to so many expert comments, which have guided me immensely in this self-study.

५-२ This श्लोक brings to mind an instance of 1979. I was attending the Silver Jubilee Convention of Bombay Productivity Council, which had the theme, ‘Management Perspectives for the 80’s’. The first session was on Management of Men. When the session was open to Qs and As, I went to the dias and put forth this observation – “When thinking of Management of men in the context of Industrial productivity, it seems we have two classes of men in mind – the workers and management staff, the blue-collared and the white-collared. There is also the general perception that the blue-collared are not as motivated to the corporate goals as the white-collared are. If it is a question of motivation, we know that in Mahabharata war, अर्जुन lost his motivation to fight and as the manager on the spot भगवान्-श्रीकृष्ण took upon himself the responsibility to motivate अर्जुन back. I think we can re-study गीता as the digest of the science and philosophy of motivation. If that was an instance of one-to-one motivation, Lokamanya Tilak saw in गीता the potential also for mass-motivation. Basically, motivation is a managerial responsibility and study of गीता with such different perspective should prove helpful.”

During lunch-break, one person came to me and said, “Mr. Abhyankar, let me first tell you that I am a Union Leader. When you made mention of गीता, for a while I thought you would mention, कर्मण्येवाधिकारस्ते… You know that that part of गीता’s philosophy is just not palatable for the working classes. But the way you put was very charming. He said, “why wouldn’t you develop it further and make a book ?” I replied, “Now, you are providing some motivation ! To be able to write a book with that different perspective, I need to study गीता myself.”

It is that instance of 1979, which is also one motivation for this project of self-study.

५-३ Studying this श्लोक at this instance brings to mind that some aspects of the science and philosophy of motivation are very much there in this श्लोक itself, especially in the phrase मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (= May you not have the affliction of अकर्म). When the subject is made fully aware of what all अकर्म means and is urged not to have any affliction of it, would not that be the best motivation ? In fact in ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना (१८-१८) motivation is said to be of three aspects, the first being ज्ञान, i.e. making the subject fully aware.

५-४ But making अर्जुन fully aware of what all अकर्म means needed much more detailing. This श्लोक, in a way, lays the foundation for all the detailing further.

शुभमस्तु ।

-o-O-o-

Written by slabhyankar अभ्यंकरकुलोत्पन्नः श्रीपादः

July 8, 2012 at 3:09 pm

Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verses 45, 46) – Post # 53

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Learning together Sanskrit and GeetA (Chapter 2 : Verses 45, 46) – Post # 53
संस्कृतभाषायाः तथा श्रीमद्भगवद्गीतायाः
अध्ययनस्य (अध्याय २ श्लोका: ४५-४६) त्रिपञ्चाशत्तमः (५३) सोपानः ।

हरिः ॐ !

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।।२-४५।।
यावानर्थ उदपाने सर्वतो संप्लुतोदके |
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ||२-४६||
Exercise 1 Rewrite this by breaking conjugations and showing component-words contained in compound words.
स्वाध्यायः १ सन्धि-विच्छेदान् कृत्वा समासानां पदानि च दर्शयित्वा पुनर्लिखतु एतत् ।

त्रैगुण्यविषया: वेदा: निस्त्रैगुण्य: भव अर्जुन ।
निर्द्वन्द्व: नित्यसत्त्वस्थ: निर्योगक्षेम: आत्मवान् ।।२-४५।।
यावान् अर्थ: उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके |
तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ||२-४६||

अत्र सन्धयः –>
  1. त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन
    1. त्रैगुण्यविषया: वेदा = त्रैगुण्यविषया वेदा (विसर्ग-संधिः)
    2. त्रैगुण्यविषया: वेदा: निस्त्रैगुण्य: = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्य: (विसर्ग-संधिः)
    3. त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्य: भव = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भव (विसर्ग-संधिः)
    4. त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन (स्वर-संधिः)
  2. निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्
    1. निर्द्वन्द्व: नित्यसत्त्वस्थ: = निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थ: (विसर्ग-संधिः)
    2. निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थ: निर्योगक्षेम: = निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम: (विसर्ग-संधिः)
    3. निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम: आत्मवान् = निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् (विसर्ग-संधिः)
  3. यावानर्थ उदपाने
    1. यावान् अर्थ: = यावानर्थ: (व्यञ्जन-संधिः)
    2. यावानर्थ: उदपाने = यावानर्थ उदपाने (विसर्ग-संधिः)
  4. सर्वतो संप्लुतोदके
    1. सर्वतः संप्लुतोदके = सर्वतो संप्लुतोदके (विसर्ग-संधिः)
      • संप्लुत-उदके = संप्लुतोदके (स्वर-संधिः)
  5. तावान्सर्वेषु = तावान् सर्वेषु (व्यञ्जन-संधिः)
Exercise 2 Paraphrase the clauses

स्वाध्यायः २ वाक्यांशशः अन्वयान् वाक्यांशानां विश्लेषणानि च ददतु
अन्वयाः -

  1. वेदा: त्रैगुण्यविषया: (भवन्ति) ।
  2. अर्जुन, निस्त्रैगुण्य: निर्द्वन्द्व: नित्यसत्त्वस्थ: निर्योगक्षेम: आत्मवान् भव ।
  3. यावान् सर्वतः संप्लुतोदके उदपाने अर्थ: (भवति)
  4. तावान् सर्वेषु वेदेषु विजानतः ब्राह्मणस्य (अर्थ: भवति)

वाक्यांशानां विश्लेषणानि  Analysis of clauses –

वाक्यांश-
क्रमाङ्कः
उद्गारवाचकम् वा संबोधनम् संबन्ध-सूचकम् कर्तृपदम् कर्मपदम् अथवा पूरकपदम् क्रियापदम् अथवा धातुसाधितम् क्रियाविशेषणानि इतरे शब्दाः वाक्यांशस्य प्रकारः
वेदा: त्रैगुण्यविषया: (भवन्ति) प्रधान:
अर्जुन (त्वम्) निस्त्रैगुण्य: निर्द्वन्द्व: नित्यसत्त्वस्थ: निर्योगक्षेम: आत्मवान् भव प्रधान:
यावान् सर्वतः संप्लुतोदके गौणः
३ अ अर्थ: (भवति) उदपाने गौणः
तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य गौणः
४ अ (अर्थ:) (भवति) सर्वेषु वेदेषु प्रधान:

Note :-

  1. The phrase संप्लुतोदके in (३) can be considered to be in the nature of सति-सप्तमी
  2. The phrase विजानतः ब्राह्मणस्य can also be considered to be in the nature of सत्-षष्ठी

स्वाध्यायः ३ समासानां विग्रहान् शब्दानां व्युत्पत्तीः विश्लेषणानि च ददतु ।
Exercise ३ Decipher the compound words, and detail grammatical analysis of all words

त्रैगुण्यविषया: वेदा:

१ त्रैगुण्यविषया: – “त्रैगुण्यविषय” इति सामासिकं विशेषणम् । अत्र पुल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः बहुवचनं च ।

  • १-१ गुणानां त्रयम् इति त्रैगुण्यम् ।
    • सत्त्व-रजस्-तमस्-इति त्रयः गुणाः । तेषां समाहारः त्रैगुण्यम् ।
  • १-२ त्रैगुण्यं विषयः येषाम् ते त्रैगुण्यविषया: (बहुव्रीहिः) ।
  • १-३ त्रैगुण्यविषया: = having the trinity of character (सत्त्व the noble, राजस् the average, तमस् the lowly, full of darkness) as their subject

२ वेदा:- “वेद” इति पुल्लिङ्गि नाम | तस्य प्रथमा विभक्तिः बहुवचनं च |

  • २-१ “विद्” इति धातुः |
    • २-१-१ “विद्” इति चुरादि (१०) सेट् आत्मनेपदी धातुः । विद चेतनाख्याननिवासेषु (विद् = to enliven, to detail, to dwell upon)
    • २-१-२ “विद्” इति अदादि (२) सेट् परस्मैपदी धातुः । विद ज्ञाने (विद् = to know)
    • २-१-३ “विद्” इति दिवादि (४) अनिट् आत्मनेपदी धातुः । विद सत्तायाम् (विद् = to establish)
    • २-१-४ “विद्” इति तुदादि (६) सेट् उभयपदी धातुः । विदु लाभे (विद् = to gain, to acquire)
    • २-१-५ “विद्” इति रुदादि (२) अनिट् आत्मनेपदी धातुः । विद विचारणे (विद् = to inquire, to think, to deliberate)
  • २-२ वेद (= The scriptures Vedas) इति विद्-धातुतः पुल्लिङ्गि नाम ।
    • २-२-१ वेद = a text, which enlivens, which details, which dwells upon (the fundamentals)
    • २-२-२ वेद = a text, which provides knowledge
    • २-२-३ वेद = a text, which establishes (the true nature of things)
    • २-२-४ वेद = a text,which helps gain (the Supreme)
    • २-२-५ वेद = a text, which motivates inquiry, thinking, deliberation
    • २-२-६ Vedas thus are scriptures which are universal. Malafide biases have spread a wrong, unfounded impression that Vedas are scriptures of Hinduism and only for HIndus. ‘Hinduism’ is itself a word coined to distinguish faiths and practices. To my knowledge no scripture of so-called Hinduism mentions that people following those scriptures should be called as Hindus. Basically the word Hindu does not find any mention in any scripture. The scriptures like Vedas are universal in their spirit and dwell upon fundamental thoughts which are eternally valid. Any inquisitive mind is welcome to dwell upon those thoughts and benefit from them. Vedas will enlighten the inquirer, not make one a Hindu, but make him a person with enlightened, broadened vision.

वेदा: त्रैगुण्यविषया: = Vedas have trinity of character (सत्त्व the noble, राजस the average, तमस् the lowly, full of darkness) as their subject

अर्जुन, निस्त्रैगुण्य: निर्द्वन्द्व: नित्यसत्त्वस्थ: निर्योगक्षेम: आत्मवान् भव ।

३ अर्जुन – “अर्जुन” (= name of third son of Kunti) इति विशेषनाम । तस्य संबोधन-प्रथमा विभक्तिः एकवचनं च ।

  • अर्जुन (= pure, blemishless) इति विशेषणमपि ।

४ निस्त्रैगुण्य: – “निस्त्रैगुण्य” इति तद्धितं विशेषणम् । अत्र पुल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • ४-१ निष्कासितं त्रैगुण्यं येन, सः निस्त्रैगुण्यः । = One who has banished (from his mind) all distinctions of character.
  • ४-२ Chapter 14 dwells entirely on this theme. Study of that entire chapter becomes detailed study of this single word.
  • ४-३ This word however is sort of critical of Vedas that they dwell upon the trinity of character. What is advocated by this word is to banish all distinctions of character. In a way, what is advocated by this word is to rise above and beyond the knowledge acquired from study of Vedas.
  • ४-४ Or this can be understood to mean, ‘think of (deliberate upon) the knowledge from the Vedas, to rise above, to go beyond all distinctions of character.

५ निर्द्वन्द्व: – “निर्द्वन्द्व” इति तद्धितं विशेषणम् । अत्र पुल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • ५-१ निष्कासितः द्वन्द्वः येन, सः निर्द्वन्द्वः = One , who has banished (from his mind) all concept of duality.
  • ५-२ द्वन्द्वः – द्वि इति भावः द्वन्द्वः = Concept of duality
  • ५-३ The concept of duality can have the context of any pair, such as happiness and sorrow, male and female, God and devotee. Being निर्द्वन्द्व is rising above and beyond the concept of all duality, no duality even between God and devotee.
  • ५-४ “Stand still and see that I am God”, says a Psalm. This can be interpreted to mean that “stand still” = meditate; “and see that I am God” = rise to a state of realization, when you can say to yourself, ‘I am God’.
  • ५-५ Quotes such as सोऽहमस्मि and अहम् ब्रह्मास्मि are regarded as महावाक्य-s “great quotes”, just for the extreme realization connoted.
  • ५-६ War itself is a situation of duality – ‘us and they’. By advocating ‘be निर्द्वन्द्व’, right there on the battlefield, what is advocated is to fight even the war with no concept of duality, no concept of ‘us and they’. How challenging, even for the intellect of a warrior of the caliber of अर्जुन ! To fight a war with no concept of duality, no concept of ‘us and they’, is to take it as a job to be done, a task to be accomplished, period; no sentiments attached, no sentiments as are implicit in the concept of ‘us and they’.

६ नित्यसत्त्वस्थ: – “नित्यसत्त्वस्थ” इति सामासिकं विशेषणम् । अत्र पुल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • ६-१ नित्यं सत्त्वम् (कर्मधारयः) ।
  • ६-२ नित्यसत्त्वे तिष्ठति इति नित्यसत्त्वस्थः (उपपद-तत्पुरुषः) ।
    • स्थ – ‘तिष्ठति’ इत्यर्थकं उपपदम् = one that stays at, one that stays with
  • ६-२ नित्यम् – “नित्य” (= consistent , eternal, perpetual) इति विशेषणम् । अत्र नपुंसकलिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • ६-३ सत्त्वे – “सत्त्व” इति तद्धितं नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनम् च ।
    • ६-३-१ सत् + त्व = सत्त्व
      • ६-३-१-१ सत् = “अस्” इति धातुः । तस्मात् कर्तरि-वर्तमानकालवाचकं विशेषणम् “सत्” ।
        • “अस्” इति अदादि (२) सेट् परस्मैपदी धातुः । अस भुवि (अस् = to be, to exist) ।
        • “अस्” इति भ्वादि (१) सेट् उभयपदी धातुः । अस गतिदीप्त्यादानेषु (अस् = (गति =) to move about, (दीप्ति =) to shine, (आदान =) to carry) ।
        • सत् =
          • what exists –> what is in evidence –> what is true
          • what moves about –> what is active –> what is alive
          • what shines –> what is not clouded –> what has no darkness, what has no mystery –> what is true, good and benevolent
      • ६-३-१-२ त्व (= अस्य अस्ति इति) गुणवाचकः प्रत्ययः ।
      • ६-३-१-३ सत्त्व = सत् इति गुणः यस्य तत् = what has all those characteristics, which are connoted by सत्.
  • ६-४ नित्यसत्त्वस्थ = One, who stays with consistent, eternal, perpetual सत्त्व.

७ निर्योगक्षेम: – “निर्योगक्षेम” इति सामासिकं विशेषणम् । अत्र पुल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • ७-१ योगेन क्षेमः इति योगक्षेमः (तृतीया-तत्पुरुषः)
  • ७-२ निष्कासितः योगक्षेमः येन, सः निर्योगक्षेम: (नञ्-बहुव्रीहिः) ।
  • ७-३ योगेन – “युज्” इति धातुः । तस्मात् पुंल्लिङ्गि नाम “योग” । तस्य तृतीया विभक्तिः एकवचनम् च ।
    • ७-३-१ “युज्” इति चुरादि (१०) सेट् उभयपदी धातुः । युज संयमने (युज् = to control) ।
    • ७-३-२ “युज्” इति दिवादि (४) अनिट् आत्मनेपदी धातुः । युज समाधौ (युज् = to be equanimous) ।
    • ७-३-३ “युज्” इति रुदादि (७) अनिट् उभयपदी धातुः । युजिर् योगे (युज् = to join) ।
  • ७-४ क्षेमः – “क्षेम” (= wellness) इति पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • ७-५ निर्योगक्षेम: = Not desirous of any (personal) happiness from योग

८ आत्मवान् = “आत्मवत्” इति तद्धितं विशेषणम् । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • ८-१ आत्मन् + वत् = आत्मवत् ।
  • ८-२ आत्मन् = soul, essence, fundamental
  • ८-३ वत् – “एवंगुणविशिष्ट” इत्यर्थकः प्रत्ययः = has such special characteristics
  • ८-४ आत्मवान् = focused on the soul, focused on the fundamental

९ भव – “भू” इति भ्वादि परस्मैपदी धातुः । भू सत्तायाम् (भू = to be, to attain) । तस्य लोट्-आज्ञार्थे मध्यमपुरुषे एकवचनम् ।

अर्जुन, निस्त्रैगुण्य: निर्द्वन्द्व: नित्यसत्त्वस्थ: निर्योगक्षेम: आत्मवान् भव = Hey अर्जुन, (strive) to be beyond the trinity of character, devoid of all duality, ever steadfast at the benevolence, beyond happiness for oneself, true to the fundamental soul.

यावान् सर्वतः संप्लुतोदके उदपाने अर्थ: (भवति)
१० यावान् – “यावत्” (= as, similar to) इति विशेषणम् । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
११ सर्वतः – (सर्व + तः)

  • ११-१ सर्व (= all) इति सर्वनाम ।
  • ११-२ तः ( = from)इति पञ्चमी-विभक्त्यर्थकः प्रत्ययः
  • ११-३ सर्वतः = from all sides

१२ संप्लुतोदके – “संप्लुतोदक” इति सामासिकं नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • १२-१ संप्लुतं उदकम् इति संप्लुतोदकं (कर्मधारयः) ।
  • १२-२ संप्लुतं – “सम् + प्लु” इति भ्वादि (१) अनिट् आत्मनेपदी धातुः । प्लुङ् गतौ (प्लु = to ply, to go, to flood) । तस्मात् कर्मणि भूतकालवाचकं विशेषणम् “संप्लुत” (= flooded, engulfed) । अत्र नपुंसकलिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • १२-३ उदकम् – “उदक” (= water) इति नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • १२-४ संप्लुतोदके = संप्लुते उदके (सति सप्तमी) = यदा उदकम् संप्लुतं तदा = when waters have flooded

१३ उदपाने – “उदपान” (= pond, well) इति सामासिकं पुंल्लिङ्गि (अथवा नपुंसकलिङ्गि) नाम । तस्य सप्तमी विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • १३-१ उद्नः पानं इति उदपानं (षष्ठी-तत्पुरुषः) ।
  • १३-२ उद्नः – “उदन्” (= water) इति नपुंसकलिङ्गि नाम । तस्य षष्ठी विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • १३-३ पानम् – “पा” इति धातुः । तस्मात् नपुंसकलिङ्गि नाम “पान” । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
    • १३-३-१ “पा” इति भ्वादि (१) अनिट् परस्मैपदी धातुः । पा पाने (पा = to drink) ।
    • १३-३-२ “पा” इति अदादि (२) अनिट् परस्मैपदी धातुः । पा रक्षणे (पा = to protect) ।
  • १३-४ उदपानम् = pond or well, (it stores and in turn protects (keeps) as much amount of water)

१४ अर्थ: – “अर्थ” (= meaning, significance) इति पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।

यावान् सर्वतः संप्लुतोदके उदपाने अर्थ: (भवति) = what significance is of pond or well, when water is flooding from all sides

तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषु (अर्थ: भवति)
१५ तावान् – “तावत्” (= like that) इति विशेषणम् । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य प्रथमा विभक्तिः एकवचनम् च ।
१६ सर्वेषु – “सर्व” (= all) इति सार्वनामिकं विशेषणम् । अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य सप्तमी विभक्तिः बहुवचनम् च ।
१७ वेदेषु – “वेद” (= the scriptures Vedas) इति पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य सप्तमी विभक्तिः बहुवचनम् च ।
१८ विजानतः – “वि + ज्ञा” इति क्र्यादि (९) अनिट् परस्मैपदी धातुः । ज्ञा अवबोधने (= to know, to realize) । तस्मात् कर्तरि वर्तमानकालवाचकं विशेषणम् “विजानन्” (= having special or supreme consciousness। अत्र पुंल्लिङ्गि । तस्य षष्ठी विभक्तिः एकवचनम् च ।
१९ ब्राह्मणस्य – “ब्राह्मण” इति पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य षष्ठी विभक्तिः एकवचनम् च ।

  • १९-१ ब्राह्मणः – ब्रह्मणः अयम् = descendant of ब्रह्म, follower of ब्रह्म, ordained by ब्रह्म
  • १९-२ ब्रह्मणः – “ब्रह्मन्” (= deity denoting supreme consciousness) इति पुंल्लिङ्गि नाम । तस्य षष्ठी विभक्तिः एकवचनम् च ।
  • १९-३ विजानतः ब्राह्मणस्य (सत्-षष्ठी) = येन ब्राह्मणेन विशेषेण ज्ञातं (ब्रह्मज्ञानं अवगतं) तस्य = when one has attained supreme consciousness

तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषु (अर्थ: भवति) = Like that (only) is the significance in all the Vedas, when one has attained supreme consciousness.
By putting together the meanings of the last two phrases, their together meaning becomes –
What significance is of pond or well, when water is flooding from all sides, like that (only) is the significance in all the Vedas, when one has attained supreme consciousness.

Exercise 4 In what meter is this verse composed ?
स्वाध्यायः ४ – अस्य काव्यस्य रचना कस्मिन् वृत्ते अस्ति ?

To decipher the meter we set the verse in four quarters –

त्रैगुण्यविषया वेदा । वर्णाः ८
निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । वर्णाः ८
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो । वर्णाः ८
निर्योगक्षेम आत्मवान् ।। वर्णाः ८
अत्र अनुष्टुभ् छन्दः । अस्य लक्षणपदम् – श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयम् सर्वत्र लघु पञ्चमम् । द्विचतुः पादयोर्-र्हस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ।।

Exercise 5 Comments, Notes, Observations, if any.

स्वाध्यायः ५ – टिप्पण्य: ।  

५-१ Detailed etymological derivation and explanatory notes have been necessary for almost every other word in these two श्लोक-s. There are so many words with so many shades of meaning, that it would become difficult to write a satisfactory all-encompassing translation, even phrase by phrase.

५-२ The meaning of the second श्लोक certainly is rhetoric. Of course pond or well has no significance when water is flooding all over. Same way, even knowledge of all the Vedas has no significance, to one who has attained ब्रह्मज्ञान, the supreme consciousness.

५-३ The phrase विजानतः ब्राह्मणस्य and especially the word ब्राह्मण therein certainly does not imply the meaning that ब्राह्मण is a person born in a Brahmin family. It speaks of a person who has attained ब्रह्मज्ञान the supreme consciousness. Attainment of ब्रह्मज्ञान is what is implied in the word विजानन्

५-४ गीता is poetry. One comes across many श्लोक-s, where similes are used to explain the concept. Here the concept of overbearing significance of ब्रह्मज्ञान, even in comparison to knowledge of the Vedas is explained by the simile of pond or well and flood. And combined in the simile is also the rhetoric.

५-५ As is mentioned at “४-२ Chapter 14 dwells entirely on the theme of निस्त्रैगुण्य”, श्लोक-s such as these in this second chapter seem to lay foundation for much more detailed discussions / clarifications in further chapters.

शुभमस्तु ।

-o-O-o-

Written by slabhyankar अभ्यंकरकुलोत्पन्नः श्रीपादः

July 6, 2012 at 10:18 pm

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